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गुरुवार, 8 जनवरी 2009

आज रात कुछ थमी-थमी सी


आज रात कुछ थमी-थमी सी

स्वप्न न जानें कैसे भटके

नयनों की कोरो से छलके

दूर स्वान की स्वर भेदी से ,हर आशाये डरी-डरी सी

दर्दो का वह उडनखटोला
ले कर मेरे मन को डोला


स्याह रात की जल-धरा से ,मेरी गागर भरी-भरी सी

शंकाओ का कसता धेरा
कैसा होगा मेरा सवेरा
मंजिल के सिरहाने पर ये ,राहें कैसी बटी-बटी सी

विक्रम

1 टिप्पणी:

  1. शंकाओ का कसता धेरा
    कैसा होगा मेरा सवेरा
    मंजिल के सिरहाने पर ये ,राहें कैसी बटी-बटी सी

    अत्यन्त सुंदर एवं ह्रदयस्पर्शी रचना .
    बधाई एवं आभार स्वीकार करें .

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