vikram7
कारवाँ बन जायेगा,चलते चले बस जाइये, मंजिले ख़ुद ही कहेगी,स्वागतम् हैं आइये.
बृहस्पतिवार, 8 मार्च 2012
होली की हार्दिक शुभकामनायें ........
रविवार, 26 फरवरी 2012
ऑस जब बन बूँद बहती,पात का कम्पन........
ऑस जब बन बूँद बहती,पात का कम्पन ह्रदय में छा रहा है
नीर का देखा रुदन किसने यहां पे,पीर वो भी संग ले के जा रहा है
लोग जो हैं अब तलक मुझसे मिले ,शब्द से रिश्तो में अंतर आ रहा है
अर्थ अपनी जिन्दगी का ढूँढ़ने में, व्यर्थ ही जीवन यहाँ पे जा रहा है
इन उनीदी आँख के जब स्वप्न टूटे,दर्द में सुख बोध छिपता जा रहा है
तोड़ कर जब दायरे आगे बढ़ा,शून्य में पथ ज्ञान छिनता जा रहा है
प्रश्न बनके कल तलक था सामने,आज वो उत्तर मुझे समझा रहा है
अब अधेरी रात में भी दूर के,दीप का जलना ह्रदय को भा रहा है
विक्रम [पुन:प्रकाशित]
शनिवार, 28 जनवरी 2012
वह सुनयना थी........
कभी चोरी-चोरी मेरे कमरे मे आती
नटखट बदमाश
मेरी पेन्सिले़ उठा ले जाती
और दीवाल के पास बैठकर
अपनी नन्ही उगलियों से
भीती में चित्र बनाती
अनगिनत-अनसमझ, कभी रोती कभी गाती
वह फिर आयी थी मेरे कमरे में
मुझे देख सकुचाई थी
नव-पल्लव सी अपार शोभा लिये
पलक संपुटो में लाज को संजोये
कॉप रही थी
जाने से पहले मांगनें आयी थी ,वात्सल्य भरा प्यार
जो अभी तक मुझसे पा रही थी
वह फिर आयी थी मेरे कमरे में
दबे पाँव
डरी सहमी सी
उस कबूतरी की तरह
भयभीत मृगी के समान
मेरे आगोश में समां गयी थी
सर में पा ,मेरा ममतामईं हाथ
आँसुओं के शैलाब से
मेरा वक्षस्थल भिगा गयी थी
सफेद वस्त्रों में उसे देख ,मैं समझ गया था
अग्नि चिता में
वह अपना
सिंदूर लुटा आयी थी
वह फिर आयी थी मेरे कमरे में
नहीं इस बार दरवाजे पर
दबे पाँव नहीं
कोई आहट नहीं
कोई आँसू नहीं
सफेद चादर से ढकी
मेरे ड्योढी में पडी थी
मैं आतंकित सा,काँपते हाथों से
उसके सर से चादर हटाया था
चेहरे पे अंकित थे वे चिन्ह
जो उसने, वासना के
सडे-गले हाथो से पाया था
मैने देखा
उसकी आँखों में शिकायत नहीं,स्वीकृति थी
जैसे वह मौन पड़ी कह रही हो
हे पुरूष, तुम हमें
माँ
बेटी
बहन
बीबी
विधवा
और वेश्या बनाते हो
अबला नाम भी तेरा दिया हैं
शायद इसीलिए
अपने को समझ कर सबल
रात के अँधेरे में,रिश्तो को भूल कर
भूखे भेडिये की तरह
मेरे इस जिस्म को, नोच-नोच खाते हो
क्या कहाँ ,शिक़ायत और तुझसे
पगले, शायद तू भूलता है
मैने वासना पूर्ति की साधन ही नहीं
तेरी जननी भी हूँ
और तेरी संतुष्ति,मेरी पूर्णता की निशानी हैं
मैं सहमा सा पीछे हट गया
उसकी आँखों में बसे इस सच को,मैं नहीं सह सका
और वापस आ गया ,अपने कमरे में
शायद मैं फिर करूँगा इंतजार
किसी सुनयना का
वह सुनयना थी
बृहस्पतिवार, 26 जनवरी 2012
घर वहाँ.......
घर वहाँ
प्रार्थना जहाँ
ईश्वर वहाँ
खामोशी जहाँ
प्रेम वहाँ
अकेलापन जहाँ
मृत्यु वहाँ
पूर्णता जहाँ
मनु दाश जी की कविता उनकी किताब ''खैर अगली बार फिर आऊगी'' से।
बुधवार, 25 जनवरी 2012
कैसा,यह गणतंत्र हमारा.........
भ्रष्टाचार , भूख से हारा
वंसवाद का लिये सहारा
कैसा,यह गणतंत्र हमारा
महंगाई ने पैर पसारा
वोटो को नोटों ने मारा
जाति-धर्म के नाग-पाश में,भ्रमित रहा मतदान हमारा
कैसा यह गणतंत्र हमारा
संसद में लगता यह नारा
जन से है जनतंत्र हमारा
लोकपाल भी लोभपाल से ,आज वही पर देखो हारा
कैसा,यह गणतंत्र हमारा
विक्रम
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें
बुधवार, 18 जनवरी 2012
तन्हाई में मै गाता हूँ.......
तन्हाई में मै गाता हूँ
यादों के बादल जब आते
मदिर-मदिर रस हैं बरसाते
शीतल मंद पवन के संग मै,अक्षय सुधा पीने जाता हूँ
तन्हाई में मै गाता हूँ
ज्वार मदन के जब हैं आते
मादक सपनें देकर जाते
मै भी कुंज,प्रणय उपवन से ,सौरभ सुमनों के लाता हूँ
तन्हाई में मै गाता हूँ
स्वप्न सदा छलने को आते
अंर्तमन को हैं भरमाते
तब करके अंत्येष्टि ह्रदय की ,परम सुखी मै हो जाता हूँ
तन्हाई में मै गाता हूँ
विक्रम
सोमवार, 16 जनवरी 2012
महाशून्य से व्याह रचायें......
महाशून्य से व्याह रचायें
क्रिया- कर्म से ऊपर उठ कर
अहम् और त्वम् यहीं छोड़कर
काल प्रबल के सबल द्वार को ,तोड़ नये आयाम बनायें
महाशून्य से व्याह रचायें
स्वाहा और स्वास्ति में अंतर
भ्रमित रहा मन यहाँ निरंतर
माया से विभ्रांत चेतना,को अवचेतन पथ पर लायें
महाशून्य से व्याह रचायें
निर्गुण और सगुण मिल जायें
दिग्विहीन हो कर बह जायें
दृगांचल अनंत हो जायें,जब प्रिय से भाँवरें रचायें
महाशून्य से व्याह रचायें
विक्रम
रविवार, 15 जनवरी 2012
जिन्दगी एक .......
जिन्दगीएक अर्ध विक्षिप्त-स्वप्न
या
फूल की कोमलता
पत्थर की कठोरता, के बीच का एक एहसास
कुछ भी हों
हम स्वतन्त्र हैं
सोचने के लिये,इसके बारे में
जब तक जीते है
उसके बाद........? हाँ मैं भी जिंदा हूँ
मेरी भी सासें चल रहीं हैं
मैं बातें भी कर रहा हूँ
अपने जैसे जिंदा लोगों से
जिंदा होने का,जिन्दगी जीने का
इससे अच्छा एहसास
नहीं है मेरे पास
जिन्दगी ने छला है ,अभी तक सबको
पर मैं इसे छल रहा हूँ
यह खेलती है ,आँख मिचोली का खेल
यह छुप जाती है
लोग इसे पागलो की तरह ढूडते हैं
मैं भी खेल रह हूँ ,यही खेल
फर्क इतना हैं
मैं छुप जाता हूँ
ये मुझे ढूडती हैं
मैं खिलखिलाता हूँ, ये चिडचिडाती हैं
यह चाहती हैं
वह छुपे ,मैं ढूढूँ
पर ऐसा नहीं हों रहा
लेकिन मैं जानता हूँ,जीतेगी वह ही
मैं थक जाऊँगाछिपते छिपते
तब वह छुप कर बैठ जायेगी
और मैं
इस खेल से थका,विश्राम की चाह में
उसे ढूढनें भी नहीं जाऊंगा
तब
हों जाएगा पूर्ण विराम
इस खेल का
शायद जिसकी अनुभूति, मुझे भी नहीं होगी
vikram [पुन:प्रकाशित]
मंगलवार, 10 जनवरी 2012
हाय, टिप्पणी व्यथा बन गई ....
हाय, टिप्पणी व्यथा बन गई
हाय टिप्पणी व्यथा बन गई
हाय ,टिप्पणी व्यथा बन गई
हाय, टिप्पणी व्यथा बन गई
विक्रम
शनिवार, 31 दिसम्बर 2011
आ,साथी नव वर्ष मनालें......
बीता कल अलविदा कह गया
जो भोगा , वह संग ले गया
धन्यवाद उसका भी कर दें,चिर-वसंत में रहनें वालें
आ,साथी नव वर्ष मनालें
स्वागत नूतन वर्ष तुम्हारा
कैसा होगा साथ हमारा ?
दीप नये नव-आशाओं के,फिर भी तेरे संग जला लें
आ,साथी नव वर्ष मनालें
सब कुछ खोकर जीने वाला
जैसे हो, कहनें ही वाला
अतुल वेदनाएँ जीवन में,सदा सुखों में रहनें वाले
आ,साथी नव वर्ष मनालें
विक्रम
बृहस्पतिवार, 29 दिसम्बर 2011
आ,मृग-जल से प्यास बुझा लें.....
आ,मृग -जल से प्यास बुझा लें
कहाँ गई मरकत की प्याली
द्रोण-कलश भी मेरा खाली
चिर वसंत-सेवित सपनों में,खोकर शायद मधु-रस पा लें
आ,मृग-जल से प्यास बुझा लें
गिर निर्झर जैसे हो कहता
समय अनवरत बहता रहता
मन कल्पित आकांक्षित गृह में,रुक अतीत से हाथ मिला लें
आ,मृग-जल से प्यास बुझा लें
है अतीत इतना ही कहता
वर्तमान ही जीवित रहता
सासों में अटके जीवन से,जन्म-मरण के प्रश्न चुरा लें
आ,मृग-जल से प्यास बुझा लें
विक्रम
शनिवार, 24 दिसम्बर 2011
पंक्षी क्या पर थके तुम्हारे......
थे नीले अम्बर के राही
सबल-सलिल सुख दुःख के ग्राही
वायु वेग से सहम गए क्यूं ,सबल पंख ये आज तुम्हारे
पंक्षी क्या पर थके तुम्हारे
उत्पीडन, निंदा के डर से
या मन मलिन विसर्जित कल से
किस कुंठा से ग्रसित हो गये,सुर शोभित ये कंठ तुम्हारे
पंक्षी क्या पर थके तुम्हारे
आ बीते कल को झुठला दे
जीवन को मिल नई दिशा दे
क्यूं अतीत से घिरे हुए हो,आज चलो तुम साथ हमारे
पंक्षी क्या पर थके तुम्हारे
........
vikram
बुधवार, 26 अक्तूबर 2011
शुभकामनायें ......
शनिवार, 8 अक्तूबर 2011
आज रात कुछ थमी-थमी सी
स्वप्न न जानें कैसे भटके
नयनों की कोरो से छलके
दूर स्वान की स्वर भेदी से ,हर आशाये डरी-डरी सी
दर्दो का वह उडनखटोला
ले कर मेरे मन को डोला
स्याह रात की जल-धरा से ,मेरी गागर भरी-भरी सी
शंकाओ का कसता धेरा
कैसा होगा मेरा सवेरा
मंजिल के सिरहाने पर ये ,राहें कैसी बटी-बटी सी
विक्रम
मंगलवार, 14 जून 2011
पूजा......
मै आज श्रीं अजय सिंह जी शहडोल ,जो मेरे आदरणीय जीजा जी है, उनकी लिखी कुछ रचनायें प्रकाशित कर रहा हूँ।
पूजा
मन की शान्ति
शक्ति
मन का उत्साहवर्धक
जय
विजयी भव होने का संकल्प
कनक
सबको समेटे
काटो पर चल कर
जीवन न्योछावर कर
खुशिया देती
निर्विकार,नि:स्वार्थ
ऐसा परिवार
कर देता है
एक नयी ऊर्जा का संचार
प्रतिदिन
जीने के लिए,चलते रहने के लिये ।
अजय
मंगलवार, 12 अप्रैल 2011
भ्रष्टाचार.............
vikram
श्री राम नवमी की हार्दिक बधाई।
बुधवार, 26 जनवरी 2011
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें
शुक्रवार, 7 जनवरी 2011
इतने दिनों बाद.......
अपनी खीची,अर्थहीन रेखा के पास
खड़ा हूँ
तुम्हारे सामाने
यादों के धुंध में
लहरा गयी है
बीते पलों की वह छाया
जब तुमने
रोका था मुझे
गुरु, सखा की भाँति
पर मै,महदाकांक्षा के वशीभूत
चला गया
कर अवहेलना
तुम्हारे आदेश की,याचना की
सर्व सिद्ध,गुणी की भाँति
याद है
अर्थहीन आकारों को
सार्थक करने के प्रयास में
रौद डाला
अपनी ही काया कों
वासना
ईर्ष्या
द्वेष के, पैरों तले
कर अपनी ही, करुणा से द्वन्द
जा लिपटा
इच्छाओं के सर्प-फण से
आज
जीवन समर में
हिम-तुषारों
पतझड़
तपिस
वर्षा से पराजित
अपनी ही प्रतिध्वनि से डरा
स्तब्ध
शब्दहीन
इस याचना के साथ
दंणवत हूँ
पा सकूं
फिर से
प्रेम
श्रद्धा
करुणा की नदी को
जो खो गयी है
मेरी इच्छाओं के रेत में
विक्रम
बृहस्पतिवार, 11 नवम्बर 2010
मै चुप हूँ......
ढूढता है तू
बन व्रतचारी
हिम शिखर में
स्वंम सिध्द मंत्रो की साधना से
मै चुप हूँ
श्रध्दा के ज्वार में
निर्माण करता है मेरे रूपों का
स्थानों का
मै चुप हूँ
अणु-अणु में खोजता है
उत्पत्ति के रहस्य
मै चुप हूँ
खुद को मान बैठता है
सर्व शक्तिमान
मै चुप हूँ
गिडगिडाता है
प्राणों के एक बुलबुले के लिए
मै चुप हूँ
सम्पूर्ण गतियों,प्रवाहों को
समझने की
तेरी
लालसा
मै चुप हूँ
देख तुम्हारी
श्रध्दा
कृतज्ञता
परिताप
मै चुप हूँ
जानता हूँ
तुम एक अंग हो
मेरे चेतन अवस्था के
जो
चलेगा निरंतर
मेरी अवचेतना तक
नई चेतना के लिए
मै चुप हूँ
विक्रम [पुन:प्रकाशित]
शुक्रवार, 5 नवम्बर 2010
यह अतीत से कैसा बंधन.......

यह अतीत से कैसा बंधन
म्रदुल बहुत थी मेरी इच्छा
देख तुम्हारी हाय अनिच्छा
तोड़ दिये मैने ही उस क्षण,पेम-परों के सारे बंधन
यह अतीत से कैसा बंधन
मौंन ह्रदय से तुम्हे बुलाया
अपनी ही प्रतिध्वनि को पाया
मेरे भाग्य-पटल पर अंकित,उस क्षण के तेरे उर क्रंदन
यह अतीत से कैसा बंधन
चिर-अभाव में आज समाया
कैसी परवशता की छाया
यादों की इस मेह-लहर का,क्यूँ करता हूँ मै अभिनंदन
यह अतीत से कैसा बंधन
vikram [पुन:प्रकाशित]
बृहस्पतिवार, 4 नवम्बर 2010
शुभकामनाऐं......
शनिवार, 16 अक्तूबर 2010
विजयादशमी के पावन पर्व पर सभी को हार्दिक शुभकामनायें.
विक्रम सिंह
सोमवार, 11 अक्तूबर 2010
तुम जियो हजारों साल....

आज मेरे परिवार की सबसे छोटी सदस्य व मेरी सबसे चहेती भतीजी प्रिय आराध्या का जन्मदिन है। मेरे व परिवार के सभी सदस्यों की और से ढेरों आशीर्वाद,व उज्वल भविष्य की शुभकामनाऐं।
"तुम जियो हजारो साल,साल के दिन हो पचास हजार"
विक्रमसिंह
रविवार, 19 सितम्बर 2010
जब हम कुछ दिन बाद मिले थे......
मेरी प्रतीक्षा मे तुम रत थे
नयन तेरे कितने विह्वल थे
एक-दूजे को देख हमारे मन, मे कितने दीप जले थे
जब हम कुछ दिन बाद मिले थे
मै आया जब पास तुम्हारे
कम्पित तन-मन हुये हमारे
अपलक तक नयनो से मुझको ,तुमने कितने प्रश्न किये थे
जब हम कुछ दिन बाद मिले थे
क्षण भर का एकांत देख कर
वक्ष-स्थल से मेरे लग कर
तेरी उर धड़कन ने मुझसे जीवन के प्रति-क्षण मागे थे
जब हम कुछ दिन बाद मिले थे
विक्रम[पुन:प्रकाशित]
शनिवार, 11 सितम्बर 2010
हें प्रभात तेरा अभिनंदन........
किरण भोर की, निकल क्षितिज से
उलझी ओस कणों के तन से
फूलों की क्यारी तब उसको, देती अपना मौन निमंत्रण
हें प्रभात तेरा अभिनंदन
भौरों के स्वर हुये गुंजरित
खग-शावक भी हुए प्रफुल्लित
श्यामा भी अपनी तानों से,करती जैसे रवि का पूजन
हें प्रभात तेरा अभिनंदन
ज्योति-दान नव पल्लव पाया
तम की नष्ट हुयी हैं काया
गोदी में गूजी किलकारी, करती हैं तेरा ही वंदन
हें प्रभात तेरा अभिनंदन
विक्रम[पुन:प्रकाशित]
शुक्रवार, 10 सितम्बर 2010
ईद की ह्रार्दिक....
बृहस्पतिवार, 9 सितम्बर 2010
मेरे अगनें में.........
अब देश के बचे इन ईमानदारों कों कही यह न सुनना पड़े,कि.....'मेरे अगनें में तुम्हारा क्या काम है'...
सिन्हा जी जाते जाते इन २०% ईमानदारों की लिस्ट भी जारी कर जाते तो कितना अच्छा होता,अब कही देश में इन २०% लोगो में खुद कों शामिल करने की होड़ न लग जाये।
सिन्हा जी ने यह भी कहा कि मात्र ४% भ्रष्टो कों सजा मिल पाती है। सवाल यह उठता है कि सब भ्रष्टो कों अगर सजा हो गयी,तो उन्हें रखेगें कहां,और सरकार कौन चलाएगा,सरकार कौन चुनेगा?
मात्र २०% लोगों की बदौलत देश चलने से रहा।
सिन्हा जी पद में रहते हुए यह बात कहते तो आप के इस ईमानदार बयान में चार चाँद लग जाते ?
vikram
मंगलवार, 7 सितम्बर 2010
यह अतीत से कैसा बंधन.......

यह अतीत से कैसा बंधन
म्रदुल बहुत थी मेरी इच्छा
देख तुम्हारी हाय अनिच्छा
तोड़ दिये मैने ही उस क्षण,पेम-परों के सारे बंधन
यह अतीत से कैसा बंधन
मौंन ह्रदय से तुम्हे बुलाया
अपनी ही प्रतिध्वनि को पाया
मेरे भाग्य-पटल पर अंकित,उस क्षण के तेरे उर क्रंदन
यह अतीत से कैसा बंधन
चिर-अभाव में आज समाया
कैसी परवशता की छाया
यादों की इस मेह-लहर का,क्यूँ करता हूँ मै अभिनंदन
यह अतीत से कैसा बंधन
vikram
मंगलवार, 31 अगस्त 2010
इतने दिनों बाद.......
अपनी खीची,अर्थहीन रेखा के पास
खड़ा हूँ
तुम्हारे सामाने
यादों के धुंध में
लहरा गयी है
बीते पलों की वह छाया
जब तुमने
रोका था मुझे
गुरु, सखा की भाँति
पर मै,महदाकांक्षा के वशीभूत
चला गया
कर अवहेलना
तुम्हारे आदेश की,याचना की
सर्व सिद्ध,गुणी की भाँति
याद है
अर्थहीन आकारों को
सार्थक करने के प्रयास में
रौद डाला
अपनी ही काया कों
वासना
ईर्ष्या
द्वेष के, पैरों तले
कर अपनी ही, करुणा से द्वन्द
जा लिपटा
इच्छाओं के सर्प-फण से
आज
जीवन समर में
हिम-तुषारों
पतझड़
तपिस
वर्षा से पराजित
अपनी ही प्रतिध्वनि से डरा
स्तब्ध
शब्दहीन
इस याचना के साथ
दंणवत हूँ
पा सकूं
फिर से
प्रेम
श्रद्धा
करुणा की नदी को
जो खो गयी है
मेरी इच्छाओं के रेत में
विक्रम
बृहस्पतिवार, 26 अगस्त 2010
मै चुप हूँ......
ढूढता है तू
बन व्रतचारी
हिम शिखर में
स्वंम सिध्द मंत्रो की साधना से
मै चुप हूँ
श्रध्दा के ज्वार में
निर्माण करता है मेरे रूपों का
स्थानों का
मै चुप हूँ
अणु-अणु में खोजता है
उत्पत्ति के रहस्य
मै चुप हूँ
खुद को मान बैठता है
सर्व शक्तिमान
मै चुप हूँ
गिडगिडाता है
प्राणों के एक बुलबुले के लिए
मै चुप हूँ
सम्पूर्ण गतियों,प्रवाहों को
समझने की
तेरी
लालसा
मै चुप हूँ
देख तुम्हारी
श्रध्दा
कृतज्ञता
परिताप
मै चुप हूँ
जानता हूँ
तुम एक अंग हो
मेरे चेतन अवस्था के
जो
चलेगा निरंतर
मेरी अवचेतना तक
नई चेतना के लिए
मै चुप हूँ
विक्रम
मंगलवार, 24 अगस्त 2010
रक्षाबंधन की बधाई......
बृहस्पतिवार, 19 अगस्त 2010
कौन है जिम्मेदार....
आज दैनिक भास्कर समाचार पत्र पढ़ रहा था तो, श्रीमती ने एक समाचार की तरफ ध्यान दिलाया,"यूनिफार्म नही दिला पाई तो बच्चो सहित माँ ने दी जान"। समाचार का सार था,"३२ वषीय कौशल्या लोधी का १० वर्षीय बेटा उमेश ४ साल की बेटी बीना आजादी के जश्न में शामिल होने के लिए यूनीफार्म मांग रहे थे। कौशल्या से जब उनका दुख़ देखा नही गया तो उसने बच्चो के साथ गांव से ढाई किलोमीटर दूर स्थित कुएं में कूदकर देश की आजादी के दिन अपनी जान दे दी"।
क्या यही है हमारे देश के लोकतंत्र का वर्त्तमान?मासूमों की यह दर्दनाक मौत, प्रश्न बनकर खडी है सामाने,कौन है इसका जिम्मेदार ,हमारी व्यवस्था,या फिर हम आप?
vikram
मंगलवार, 17 अगस्त 2010
कारवाँ बन जायेगा,........
कारवाँ बन जायेगा,चलते चले बस जाइये
मंजिले ख़ुद ही कहेगी,स्वागतम् हैं आइये
पीर को भी प्यार से,वेइंतिहाँ सहलाइये
आशिकी में डूबते,उसको भी अपने पाइये
हैं नजारे ही नहीं,काफी समझ भी जाइये
देखने वाले के नजरों,में जुनूँ भी चाहिये
बुत नहीं कोई फरिश्ते,वे वजह मत जाइये
रो रहे मासूम को,रुक कर ज़रा दुलराइये
टूटती उम्मीद पे,हसते हुए बस आइये
अपने पहलू में नई,खुसियां मचलते पाइये
विक्रम[पुन:प्रकाशित]
सोमवार, 16 अगस्त 2010
काश ऐसा न हो....
कल स्वत्रन्त्रता दिवस पर लोगो की उदासीनता देख मन भारी हो गया। सरकारी स्तर पर होने वाले आयोजन भी रश्मी बन कर रह गये है। आने वाले कल में जिनके बदौलत यह आजादी नसीब हुयी,उनके साथ साथ हम आजादी के माइने भी न भूल जाए। काश ऐसा न हो.......
vikram
ट्विट्टर पर व्यक्त मेरे ..........
vikram
शनिवार, 14 अगस्त 2010
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें....
आजादी के लिये.......
याद दिलाने उनकी फिर से आई है ये बेला
आइये याद उनकी करें साथियों
इस वतन के लिये भी जिये साथियो
वे तो हिन्दू भी थे,ऒर मुसलामा भी थे
पारसी सिक्ख देखो ईसाई भी थे
पर सही बात ये है मेरे दोस्तो
सबसे पहले वतन के सिपाही वो थे
नाम से उनके रोशन जहाँ साथियो
इस................................................
ज्योति आजादी का लेके चलते जो थे
उनसे दुश्मन के सीने दहलते भी थे
राम के साथ अब्दुल भी फाँसी चढा
जो वतन पर मिटे भाई भाई ही थे
उनकी कुर्बानी पर फक्र है साथियो
इस.............................................
खो अंधेरों में जो रोशनी दे गये
खुद को करके फंना जिन्दगी दे गये
आज का दिन उन्ही का दिया साथियो
इस गुलिस्ताँ के हकदार माली वो थे
मरते -मरते भी कह कर गये साथियो
इस.................................................
थे कहाँ से चले हम कहाँ आ गये
भाई -भाई के दुश्मन है क्यूँ बन गये
अपना बन के यहां छल गया जो हमे
वो भी जयचंद और मीरजाफर ही थे
उनकी चालों से अब हम बचे साथियो
इस.............................................
vikram
शुक्रवार, 30 जुलाई 2010
सच क्या है ?...........
अखबार पढ रहा था,देश के ७७% लोग अभी भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे है। अगर यह सच हैं,तो आजादी के बाद ये तमाम उपलब्धिया जो हर सरकार गिनाती है,इनके माइने क्या है ?कालेज की पढाई पूरी करके सन ७७ में घर आया। एक बाँध बनाने का ठेका चाचा जी ने लिया था। काम देखने के लिए मुझे वहाँ भेज दिया गया। मजदूरों की मजदूरी थी मात्र दो रूपया। मैने पचास पैसे मजदूरी बढा दी, बड़े किसानो व अन्य ठेकेदारों ने इसका बिरोध किया। चाचा जी तक बात पहुची,मुझे बुला कर पूछा, मैने बताया की काम में बचत काफी है,उस हिसाब से काम की मजदूरी कम हैं। उन्होंने हिसाब देखा, और मज़दूरों की मजदूरी तीन रुपये पचास पैसे कर दी ।उस समय मोटा चावल पचास पैसे प्रति किलो मिल जाता था। उतने पैसे में सात किलो , आज आम मजदूर की मजदूरी है,सौ रुपये प्रति दिन, बाजार में मोटा चावल हैं,सोलह रुपये किलो।
मजदूर खुले बाजार में सात किलो चावल उतने रुपये में नही खरीद सकता।परिवार ,जिसमे पति पत्नी सहित दो बच्चे हो, और उनकी आमदनी पाच सौ रुपये प्रति दिन हो,तब कही जाकर आज का खेतिहर मजदूर अपने परिवार का सही ढंग से पालन पोषण कर सकता है। आज अमीर,बड़ा अमीर ,गरीब और गरीब होता जा रहा हैं। जिम्मेदार हैं हमारे देश की वर्त्तमान व्यवस्था । क्यान्यायपालिका,व्यवस्थापिका,कार्यपालिका,सभी दोषी हैं वर्त्तमान व्यवस्था के लिए। कानून की पकड़ भी आम आदमी पर हैं, सबल का बाल बाका भी नही होता। इसी सच्चाई को उजागर करने के उद्देश्य से"सच क्या है"नाम से यह लेख प्रकाशित कर रहा हूँ,जिसकी पहली कड़ी है,पर्यावरण पर कितने जागरूक है, हम व हमारी सरकार,क्रमश.......
vikram
सोमवार, 19 जुलाई 2010
पीढी का अंतराल.....
कैंसर से पीड़ित
अपने पिता का
इलाज करने वाले कैंसर विशेषज्ञ
के बिलों को निपटाने में लगा था
मेरा बेटा
अपने साथियो के साथ
अपना सत्रहवां जन्मदिन
मन रहा था।
निराशा में डूबा हुआ मै
अपने बगीचे के पुराने पौधॉ को देखता रहा
जिनकी काट-छाँट जरूरी थी
नई कपोको और कलियों के लिए
मनु दाश
दाश जी की कविता उनकी किताब ''खैर अगली बार फिर आऊगी'' से।
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
क्या हो गया हैं गडकरी को........
अपने आप को मर्यादित व भारतीय सभ्यता का प्रतीक मानने वाली भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष को क्या हो गया है जो आये दिन वोछे बयान देने से बाज नही आ रहे हैं। भारतीय राजनीत में पहली बार इतनी पंगु मानसिकता का अध्यक्ष देखने को मिला हैं। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता भी मौन हैं। क्या राम दल गडकरी के आते रावण दल मे बदल गया या फिर इस दुर्योधन पर किसी का बस नही, जो भारतीय समाज की सदियों पुरानी परम्परा का चीर हरण करने जुटा हैं। दिग्विजय सिंह के वल्दियत पर सवाल उठाने वाले इस व्यक्ति के बारे में मेरी एक ही राय हैं, या तो यह पागल हैं,या भारतीय मूल का नही हैं। भारतीय जनता पार्टी को चाहिए की गडकरी का मानसिक परीक्षण कराये या डी.एन.ए.टेस्ट, सच्चाई सामाने आ जायेगी। राजनीत का यह गंदा खेल समाज को इतना दूषित कर देगा ,जिसको दूर करने में कई दसक लग जायेगे।
vikram
अपने आप को मर्यादित व भारतीय सभ्यता का प्रतीक मानने वाली भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष को क्या हो गया है जो आये दिन वोछे बयान देने से बाज नही आ रहे हैं। भारतीय राजनीत में पहली बार इतनी पंगु मानसिकता का अध्यक्ष देखने को मिला हैं। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता भी मौन हैं। क्या राम दल गडकरी के आते रावण दल मे बदल गया या फिर इस दुर्योधन पर किसी का बस नही, जो भारतीय समाज की सदियों पुरानी परम्परा का चीर हरण करने जुटा हैं। दिग्विजय सिंह के वल्दियत पर सवाल उठाने वाले इस व्यक्ति के बारे में मेरी एक ही राय हैं, या तो यह पागल हैं,या भारतीय मूल का नही हैं। भारतीय जनता पार्टी को चाहिए की गडकरी का मानसिक परीक्षण कराये या डी.एन.ए.टेस्ट, सच्चाई सामाने आ जायेगी। राजनीत का यह गंदा खेल समाज को इतना दूषित कर देगा ,जिसको दूर करने में कई दसक लग जायेगे।
vikram
बृहस्पतिवार, 1 जुलाई 2010

मै आज श्रीं अजय सिंह जी शहडोल ,जो मेरे आदरणीय जीजा जी है, उनकी लिखी कुछ रचनायें जो अग्रेजी में है,प्रकाशित कर रहा हूँ।
1-
Gifted are those
who have their siblings
around them
in their hours of despair
Jai, Shakti, Pooja
are a formidable trimity
only if they choose to be so
dictate no tems
decide they must
on their own
whatever it is
will be good
and long lasting
Amen.
2-
I am here ,I am there
when awake,I am nowhere.
why this gloom?
Negative thoughts lead nowhere
why bother above[them?
AJAY
बुधवार, 30 जून 2010
क्यूँचुप हो कुछ बोलो श्वेता.....
मौंन बनी क्यूँमुखरित श्वेता
क्षित की भी तुम सुन्दर-आभा
नील-गगन की हो परिभाषा
है पावक तुमसे ही शोभित
जल की हो तुम ही अभिलाषा
है समीर तुमसे ही चंचल, द्रुपद-सुता सी हो न श्वेता
महाशून्य से उद्दगम करती
दिग्ग-विहीन होकर हो बहती
सरिता महा-मौन की कैसी
हो अरूप रूपों को रचती
मौंन मुखर जीवन -छन्दो में, बस तुम ही होती हो श्वेता
इक कल को कल्पना बनाती
इक कल को जल्पना बनाती
वर्त्तमान भ्रम की परछाई
स्वप्न-छालित जागरण दिखाती
काल-प्रबल की हर स्वरूप की ,जननी क्या तुम हीं हो श्वेता
शब्द एक पर अर्थ कई है
डोर एक पर छोर नहीं है
जीवन मरण विलय कर जाते
रंग हीन के रंग कई है
हो अनंत का अंत समेटे, फिर भी अंत हीन हो श्वेता
है खुद से संलाप तुम्हारा
पंच-तत्व का गीत ये न्यारा
है अखंड आशेष प्रभा-मय
मौंन स्वयम्भू ब्रम्ह तुम्हारा
हो अद्रश्य में द्रश्य, द्रष्टि से फिर भी तुम ओझल हो श्वेता
विक्रम [पुन: प्रकाशित ]
बृहस्पतिवार, 24 जून 2010
इन्हें भूलने का ,मन करता होगा..

सुनो
तन्हाई में
अधरों पर अधर की छुवन
गर्म सासों की तपन
और एक दीर्ध आलिगन का एहसास
होता तो होगा
बीता कल कभी कभी
चंचल भौरे की तरह
मन की कली पर मडराता तो होगा
किसी न किसी शाम
डूबते सूरज को देख
मचलती कलाइयो को छुडा कर
दबे पाँव
घर की चौखट पर आना याद तो आता होगा
मुझे तो भुला दोगी
पर सच कहना
क्या
इन्हें भूलने का ,मन करता होगा
विक्रम[पुन:प्रकाशित
शुक्रवार, 18 जून 2010
मैं जीवन का बोधि-सत्व क्याँ खो बैठा हूँ .......
मैं जीवन का बोधि-सत्व क्याँ खो बैठा हूँ
या जीवन के सार-तत्व में आ बैठा हूँ
मैं अनंत की नीहारिका में अब क्या ढूढूँ
स्वंम पल्लवित सम्बोधन में खो बैठा हूँ
राग और अनुराग लिये मैं जी लेता हूँ
जीवन का यह जहर निरंतर पी लेता हूँ
सत्यहीन क्या सृजन कभी भी संभव होगा
आरोपित जब क्रिया कर्म को दूढ़ हूँ
दंड लिए मैं सहभागी को दूढ़ रहा हूँ
इसी क्रिया में अपनों से ही रूठ रहा हूँ
मैं भुजंग की फुफकारो में रच बस बस करके
मलय पवन की शीतलता को खोज रहा हूँ
इति जीवन अध्याय निकट मैं समझ रहा हूँ
न जाने क्यूँ प्रष्ठ नये मैं जोड़ रहा हूँ
कठपुतली बस नचे डोर ये छोड़ न पाये
इस सच से मैं नहीं स्वयं को जोड़ रहा हूँ
vikram
मंगलवार, 15 जून 2010
अर्थ हीन सम्वादों का सिलसिला
मै तोडना नही चाहता
शायद इसी बहाने
मै तुम्हे छोडना नही चाहता
विक्रम
सोमवार, 14 जून 2010
जीवन का सफर .......
कहीं तेरे नाम ,कहीं मेरे नाम ,कहीं और किसी के नाम
हर राही की अपनी राहे, हैं अपनी अलग पहचान
मंजिल अपनी ख़ुद ही चुनते, पर डगर बडी अनजान
खो जाती सारी पहचाने, जो किया कहीं विश्राम
कहीं तेरे नाम ,कहीं मेरे नाम ,कहीं और किसी के नाम
इन राहों में मिलते रहते,कुछ अपने कुछ अनजान
हर राही के आखों में सजे कुछ सपने कुछ अरमान
सपनों से सजी इन राहों में, कहीं सुबह हुयी कहीं शाम
कहीं तेरे नाम कहीं मेरे नाम कहीं और किसी के नाम
vikram [पुन:प्रकाशित]
रविवार, 13 जून 2010
अल्ला मेघ दे...........
अल्ला मेघ दे पानी दे, जीवन कर धानी ,मौला मेघ दे
इक जिन्दगानी दे कोई कहानी दे,कोई कहानी,अल्ला मेघ दे
नयनों के कोर सूखे
आँचल के छोर सूखे
मन के चकोर छूटे
आशा की डोर टूटे
मन को पीर दे नीर दे, नीर दो खारे,अल्ला मेघ दे
तरुवर के पात जैसे
मेरे हैं गात वॆसे
कोई पतझड आये
जीवन निधि ले न जाये
इसको प्यास दे आश दे ,बोल दो प्यारे, अल्ला मेघ दे
पनघट मे शाम जायें
फिर भी कोई न आये
मेरे अंगना से जाये
इसको रीत दे सीख दे गीत दो प्यारे,अल्ला मेघ दे
ममता के दे वो साये
दिल में जो आश जगाये
नन्ही किलकारी भाये
गोदी छुप मुझे सताये
ऎसी हूक दे कूक दे पीक कुंआरे, अल्ला मेघ दे
vikram
[पुन: प्रकाशित]शुक्रवार, 11 जून 2010
मैनें अपने कल को देखा....
उन्मादित सपनों के छल से
आहत था झुठलाये सच से
तृष्णा की परछाई से,उसको मैने लड़ते देखा
मैने अपने कल को देखा
वर्त्तमान से जो कुछ पाया
उससे लगता था घबडाया
बीते कल की ओर पलट कर,जाने की कोशिश में देखा
मैने अपने कल को देखा
उसको अपनी दुर्बलता पर,फूट-फूट कर रोते देखा
मैने अपने कल को देखा
vikram
मंगलवार, 1 जून 2010
वह सुनयना थी ...............
वह सुनयना थी
कभी चोरी-चोरी मेरे कमरे मे आती
नटखट बदमाश
मेरी पेन्सिले़ उठा ले जाती
और दीवाल के पास बैठकर
अपनी नन्ही उगलियों से, भीती में चित्र बनाती
अनगिनत-अनसमझ, कभी रोती कभी गाती
वह फिर आयी थी मेरे कमरे में
मुझे देख सकुचाई थी
नव-पल्लव सी अपार शोभा लिए,पलक संपुटो में लाज को संजोये
सुहाग के वस्त्रों में सजी,उषा की पहली किरण की तरह, कॉप रही थी
जाने से पहले मागने आयी थी ,वात्सल्य भरा प्यार
जो अभी तक मुझसे पा रही थी
वह फिर आयी थी मेरे कमरे में
दबे पाव,डरी सहमी सी, उस कबूतरी की तरह
जिसके कपोत को बहेलिये ने मार डाला था
संरक्षण विहीन
भयभीत मृगी के समान ,मेरे आगोश में समां गयी थी
सर में पा ,मेरा ममतामईं हाथ
आसुवो के शैलाब से,मेरा वक्षस्थल भिगा गयी थी
सफेद वस्त्रों में उसे देख ,मैं समझ गया था
अग्नि चिता में,वह अपना ,सिंदूर लुटा आयी थी
वह फिर आयी थी मेरे कमरे में
नहीं इस बार दरवाजे पे
दबे पाँव नहीं
कोई आहट नहीं
कोई आँसू नहीं
सफेद चादर से ढकी, मेरे ड्योढी में पडी थी
मैं आतंकित सा, कापते हाथो से, उसके सर से चादर हटाया था
चेहरे पे अंकित थे वे चिन्ह
जो उसने, वासना के, सडे-गले हाथो से पाया था
मैने देखा,उसकी आखों में शिकायत नहीं,स्वीकृति थी
जैसे वह मौन पड़ी कह रही हो
हे पुरूष, तुम हमे
माँ
बेटी
बहन
बीबी
विधवा
और वेश्या बनाते हो
अबला नाम भी तेरा दिया हैं
शायद इसीलिए ,अपने को समझ कर सबल
रात के अँधेरे में,रिश्तो को भूल कर
भूखे भेडिये की तरह
मेरे इस जिस्म को, नोच-नोच खाते हो
क्या कहाँ ,शिक़ायत और तुझसे
पगले, शायद तू भूलता है
मैने वासना पूर्ति की साधन ही नहीं
तेरी जननी भी हूं
और तेरी संतुष्ति,मेरी पूर्णता की निशानी हैं
मैं सहमा सा पीछे हट गया
उसकी आखों में बसे इस सच को मैं नहीं सह सका
और वापस आ गया ,अपने कमरे में
शायद मैं फिर करूगां इंतजार
किसी सुनयना का
वह सुनयना थी
बृहस्पतिवार, 13 मई 2010
जीवन का यह सच भी देखा...........
जीवन का यह सच भी देखा
उत्तर नहीं प्रश्न इतने हैं
वृक्ष एक पर साख कई हैं
अनचाहे हालातों से भी, हाथ मिलाते सबको देखा
जीवन का यह सच भी देखा
दाता की वापिका हैं गहरी
काल-प्रबल हैं उसका प्रहरी
लघु-अंजलि में भर लेने की ,चाहत में जग को मैं देखा
जीवन का यह सच भी देखा
जब असत्य का तम गहराता
स्वप्निल छल से जग भ्ररमाता
सबल मुखरता को भी उस क्षण ,मौंन साधते मैने देखा
जीवन का यह सच भी देखा
विक्रम
शनिवार, 17 अप्रैल 2010
कैंसर वार्ड में दीवाली
मनु दाश जी उडिया के जाने माने कवियों में से एक है। अग्रेजी, उडिया के अति संवेदनशील कवि की हिन्दी रुपान्तरण की प्रथम पुस्तक ''खैर, अगली वार फिर आऊँगी'' पढने का अवसर मिला । प्रस्तुत है मनु दाश जी की एक कविता।
कैंसर वार्ड में दीवाली
कोई मोमबत्ती जलाई नहीं गयी
और ना धमाके बाहर
फटाखों के सुने गए
केवल था मौन लबालब
अधरे गर्भ में गलियारों के
मेरे पिता असहाय इंतजार करते रहे
बायोप्सि रिपोर्ट का
जिसे मुंबई से पहुचना था
एक विवश दंडित से
याचना करते फॆसले की
ऊपरी न्यायालय से
भविष्य जकड़ा है
अनिश्चितता के गर्भ में
जीवन गुजरता है
एक बेडे की तरह
विपरीत जलधाराओं में।






