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बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

जीवन की जब शाम यहां पर आयेगी











जीवन की जब शाम यहां पर आयेगी

आ कितना आराम मुझे दी जायेगी

तन्हाई से लड़ते- लड़ते थक जायेगें

जीवन का यह बोझ नहीं ढो पायेगें

ऐसे में वो चुपके से आ जायेगी

आ...........................................

कोई शिकवे कोई न गिले रह जायेगें

बीते कल के अपने बन सपने आयेगें

इन सपनों से वो दूर मुझे ले जायेगी

आ..............................................

बैरन निदिया भी रोज मुझे तरसाती हैं

रह कर के भी पास नहीं ये आती हैं

उसके आते ही आकर मुझे सुलायेगी

आ......................................................

vikram

2 टिप्‍पणियां:

  1. बैरन निदिया भी रोज मुझे तरसाती हैं

    रह कर के भी पास नहीं ये आती हैं

    उसके आते ही आकर मुझे सुलायेगी

    आ......................................................


    -बहुत सही!

    उत्तर देंहटाएं