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रविवार, 1 फ़रवरी 2009

साथी तुम बन आये मेरे






साथी तुम बन आये मेरे


जीवन काल-प्रबल की क्रीडा


अंत-हीन थी मेरी पीडा


आकर मेरे ह्रदय पटल पर ,आशाओं के चित्र उकेरे


साथी तुम बन आये मेरे


महा-मौंन यह भंग हुआ हैं


मुखर स्वरों में गान हुआ हैं


आज मेरे हर रोम-रोम में ,खुशिया बैठी डाले डेरे


साथी तुम बन आये मेरे


उर-उपवन मेरा महका हैं


हर पल अब मधुमास बना हैं


आज मेरे नयनो ने देखे , सपने मधुर सुनहरे


साथी तुम बन आये मेरे


vikram

7 टिप्‍पणियां:

  1. उर-उपवन मेरा महका हैं
    हर पल अब मधुमास बना हैं
    आज मेरे नयनो ने देखे , सपने मधुर सुनहरे
    साथी तुम बन आये मेरे

    अत्यन्त सुंदर . आपके भावनात्मक स्तर और भावाभिव्यक्ति की क्षमता की दाद देनी पड़ेगी .
    बहुत ही सुंदर .

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  2. इस पूरी कविता में शब्द और भाव का साहचर्य उल्लेखनीय है.
    ऐसा लिखा देखता हूं, लगता है-अपना हमराह मिल गया .

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  3. आप सभी का बहुत वहुत धन्यवाद

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