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रविवार, 1 फ़रवरी 2009

कवि सुन तू मेरे मन के द्वन्द






कवि सुन तू मेरे मन के द्वन्द

इक कली आज मुरझाई

उस पर बहार न आई

फेका उसको पथ-रज में

रच दे उस पे भी एक छंद

कवि ...........................

मधु-ॠतु था जीवन मेरा

हर पल था नया सवेरा

वे प्रेम पुष्प ले आये

बाजे थे मेरे मन मृदंग

कवि ........................

मन मीत मेरा क्या रूठा

हर चित्र अधूरा छूटा

न माने मृदु मनुहारो से

क्यू वीणा के स्वर हुये मंद

कवि ...................................

विक्रम

2 टिप्‍पणियां:

  1. मन मीत मेरा क्या रूठा
    हर चित्र अधूरा छूटा


    --क्या बात है, बहुत खूब!

    उत्तर देंहटाएं