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शनिवार, 30 मई 2009

आ फिर राग बसंती छेड़े ..........



आ फिर राग बसंती छेड़े


है विहान भी रंग ,रंगीला


मलय पवन का राग नशीला


शरमाई सी मुझको तकती,तेरे नयनों को अब छेड़े


आ फिर राग बसंती छेड़े


कितने मधु-रितु ,साथ पुराना


सुखद बहुत ये ,साथ निभाना


तेरे मदमाते अधरों के,जाम अभी भी मुझको छेड़े


आ फिर राग बसंती छेड़े


ईश विनय, मन करे हठीला


बना रहे यह साथ,सजीला


तेरे मेरे मन उपवन में,तान बसंती कोयल छेड़े


आ फिर राग बसंती छेड़े


vikram


2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! वाह ! वाह !

    अतिसुन्दर अभिव्यक्ति !!...वाह !

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  2. इस गरमी के मौसम में
    पसीने की दुर्गंध के बीच
    इस गीत से निकली
    वासंती बयार ने
    तन और मन, दोनों को
    प्रणय की सुगंध से महका दिया!

    उत्तर देंहटाएं