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मंगलवार, 23 जून 2009

साथी दूर विहान हो रहा........

साथी दूर विहान हो रहा

रवि रजनी का कर आलिंगन
अधरों को दे क्षण भर बन्धन

कर पूरी लालसा प्रणय की, मंद-मंद मृदु हास कर रहा
साथी दूर विहान हो रहा
अपना सब कुछ आज लुटा कर
तृप्ति हुयी यौवन सुख पाकर

शरमाई रजनी से रवि फिर, मिलने का मनुहार कर रहा
साथी दूर विहान हो रहा
रजनी पार क्षितिज के जाती
आखों से आंसू छलकाती

झरते आंसू पोछ किरण से, दूर देश रवि आज जा
रहा
साथी दूर विहान हो रहा

vikram

4 टिप्‍पणियां:

  1. साथी दूर विहान हो रहा
    bahut sunder chitran.

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  2. अद्भुत !!! अद्वितीय !!!!

    विक्रम जी ,आपकी इस मनोहारी रचना ने तो मन ही हर लिया......कई बार बार पढ़ चुकी हूँ पर मन ही नहीं भर रहा......
    प्रकृति का इतना कोमल सुन्दर वर्णन मन को बाँध ले रहा है....

    इस सुन्दर लेखन के लिए बहुत बहुत आभार....माता आपकी कलम पर सदा सहाय रहें....शुभकामनाये..

    उत्तर देंहटाएं