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बुधवार, 24 जून 2009

वह गगन उठाने आया है........

वह गगन उठाने आया है ?

उजले कागों सा,तन धरके

मन में सारे छल -बल भरके

भरमाये से जनमानस को,वह बोध दिलाने आया है

वह गगन उठाने आया है ?

तृष्णा ख़ुद की न बुझ पाती

पर जन-जन को लिखता पाती

तेरे मेरे हर सपने को,वह राह दिखाने आया हैं

वह गगन उठाने आया है ?

दिग्गभ्रमित सदा ही रहता है

वह कभी नही कुछ करता है

फिर भी वाणी के बल बूते,जन नायक बनने आया है

वह गगन उठाने आया है ?

विक्रम


3 टिप्‍पणियां:

  1. bhaasha par aapki pakad kamaal ki hai...likhte rahiye isi shiddat se


    www.pyasasajal.blogspot.com

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  2. बहुत सुंदर. भाव सघन. व्यंग्यमय रचना.

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