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मंगलवार, 7 जुलाई 2009

साथी थोड़ी सी मधु पी है.......

साथी थोड़ी सी मधु पी है

निर्मम था ,वह एकाकीपन
जिह्वा हीन कंठ सा क्रंदन

आयें रुदन श्रवन कर मेरे, उर-मधु से पीडा हर ली है
साथी थोड़ी सी मधु पी है

नयन स्वप्न को,शून्य हृदय को
मेरे जीवन के हर पल को

चिर अभाव हर तुमने प्रेयसि, सतरंगी आशा निधि दी है
साथी थोड़ी सी मधु पी है

नव कालियां पा उपवन महके
प्रणय स्वप्न नयनों में झलके

तेरे पलक संपुटो की, मदिरा उर प्याले में भर ली है
साथी थोड़ी सी मधु पी है

vikram

5 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut hi sunder.Aap bahut spasht hindi me utkrasht rachanayen likhet hai !

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  2. साथी थोड़ी सी मधु पी है
    bhaut khoob

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  3. बहुत ही सुन्दर कविता लिखते है ............आपकी कविता का स्वरुप
    बहुत ही सुन्दर है ..........अल्फाज़ कम पड रहे है ...........बधाई

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