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सोमवार, 6 जुलाई 2009

पंक्षी क्या पर थके तुम्हारे..........

पंक्षी क्या पर थके तुम्हारे

थे नीले अम्बर के राही
सबल-सलिल सुख दुःख के ग्राही

वायु वेग से सहम गए क्यूं ,सबल पंख ये आज तुम्हारे

उत्पीडन, निंदा के डर से
या मन मलिन विसर्जित कल से

किस कुंठा से ग्रसित हो गये,सुर शोभित ये कंठ तुम्हारे

आ बीते कल को झुठला दे
जीवन को मिल नई दिशा दे

क्यूं अतीत से घिरे हुए हो,आज चलो तुम साथ हमारे

vikram

4 टिप्‍पणियां:

  1. आ बीते कल को झुठला दे
    जीवन को मिल नई दिशा दे
    ==
    आशा और आह्वान सबल कर देंगे पंछी के थके पर को
    बहुत सुन्दर और सार्थक कविता

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  2. प्रभावpurn रचना ..कमाल लिखा है आपने

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  3. आ बीते कल को झुठला दे
    जीवन को मिल नई दिशा दे

    क्यूं अतीत से घिरे हुए हो,आज चलो तुम साथ हमारे..sundar bhaav

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  4. बहुत सुन्दर और उम्दा भाव एवं शब्द संयोजन!!

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