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गुरुवार, 9 जुलाई 2009

आज अधरो............





आज अधरो पर अधर रख
मधुभरी
यह मौन सी शौगात मैने पा लिया है
कल ह्र्दय मे
उस पथिक सी थी विकलता
राह जिसको न मिली हो साझ तक मे
द्वार मे दस्तक लगाने को खडी हो
ले निशा फिर
मौत का जैसे निमन्त्रण
उन पलो मे
सजग प्रहरी सा तुम्हारा आगमन
क्या कहू मै'
वक्त थोडा
शब्द कम है
आज नयनो मे नयन का प्यार रख
मदभरी
यह प्रीत की पहचान मैने पा लिया है

विक्रम

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचनाएँ तो बस मुग्ध और निशब्द कर देती हैं..........माँ शारदा का वरदान है आपपर.....ऐसे ही लिखते रहें.....अनंत शुभकामनाये....

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  2. क्या कहू मै'
    वक्त थोडा
    शब्द कम है
    आज नयनो मे नयन का प्यार रख
    मदभरी
    यह प्रीत की पहचान मैने पा लिया है
    bahut sundar likha hai .badhai ho .

    उत्तर देंहटाएं
  3. विक्रम जी
    आपकी रचना के बारे मे रंजना जी ने सही कहा,आपकी रचनाएँ तो बस मुग्ध और निशब्द कर देती हैं. मेरी भी शुभकामनाये

    उत्तर देंहटाएं