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मंगलवार, 21 जुलाई 2009

वसीयत ........

प्रिय
लगता हैं मौत से घबडा गये हों
अपने साथ साथ
अपने उत्ताराधिकारी को भ्रष्ट कर रहे हों
अरे उसे अपना कल बनाना हैं
आज तक तुम थे,कलउसे मेरी शरण में आना हैं
मेरे बेटे
जो अब आ रहे हैं
वो मानते हैं
खुद को दुनिया का भगवान
करने दो नतमस्तक होकर मुझे इनका सम्मान
बरना
कर देगें कोड़ों के मारो से छलनी
मेरा जिस्म
जला देगे,मेरी झोपडी
गडा देगे,गंदे नाखून
किसी मासूम बाला के बदन में
बच्चे इनसे बचना
हों सके तो
नतमस्तक ही रहना
ओह
आइये राजनीतिज्ञ
लगता मेरे अंत समय से नहीं थे आप अनभिग्य
हमने सुना हैं
हमारे दुःख तकलीफो का करते करते बयान
आप हों गए हैं अति विशिष्ट इंसान
अब हमारे पास क्यूँ आये हैं श्रीमान
क्या कहाँ
मेरी मौत पर आँसू बहाना हैं
गरीबो के सच्चे रहनुमा हों
इस बात का एहसास ,मेरी औलाद को कराना हैं
आप भी आ गये मेरे हमराज
क्या कह कर पुकारु
लेखक
चिन्तक
पत्रकार
या फिर कलाकार
तुमने तो देखा हैं
होते हुए मुझ पर अत्याचार
शोषित पीडित
आप का प्रिय पात्र रहा हैं
शायद मेरे जैसा इंसान
आप की जीविका का आधार रहा हैं
आपने हमारे दुखो को ऐसा दर्शाया
जिसे देख मेरा शोषक भी थर्राया
पदकों फूलों उपहारों से
तुमने उसी से अपना सम्मान कराया
यह सोच मैं भी शर्माया
जिसे मैने भोगा था
उसकी इतनी अच्छी अभिव्यक्ति
मैं क्यूँ नहीं कर पाया
मैं समझा था तुम्हे अपना हमराही
पर देख रहा हूँ
जाने अनजाने
तुम भी बन गये हों
मेरे आहों के व्यापारी
मेरे बाद मेरा बेटा
बन जाएगा मेरी वसीयत
ओर तुम लोग
इस वसीयत के उत्ताधिकारी
vikram

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत बहुत अच्छा लिखा है आपने

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  2. bahut hi samwedansheel rachana ........dil se kaee baar gujari ......kawita me kabhi ufanate raha our kabhi dubata raha .......bahut bahut badhiya

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  3. मन में उठती त्रासदी........... antas के दर्द को उतारा है इस रचना में...........bahoot samvedan sheel रचना

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  4. कितने सघन भावो को पिरोया है
    सम्वेदनाओ को करीने से सजाया है.
    बहुत सुन्दर

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