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बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

तिमिर बहुत गहरा होता है..........

तिमिर बहुत गहरा होता है

रात चाद जब नभ मे खोता
तारों की झुरुमुट मे सोता

मेरी भी बाहों मे कोई,अनजाना सा भय होता है

यादों के जब दीप जलाता

उतना ही है तम गहराता

छुप गोदी मे मॆ सो जाता ,शून्य नही देखो आता है

कही नीद की मदिरा पाता
पी उसको हर आश भुलाता

रक्त नयन की जल धारा को, जग कैसे कविता कहता है

विक्रम
[पुन:प्रकाशित]

18 टिप्‍पणियां:

  1. रक्त नयन की जल धारा को, जग कैसे कविता कहता है...


    क्या बात कही ..वाह ! वाह ! वाह !

    मन को मुग्ध करती अतिसुन्दर रचना सदैव की भांति......

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  2. यादों के जब दीप जलाता
    उतना ही है तम गहराता
    बहुत खूब सुन्दर रचना

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  3. रक्त नयन की जल धारा को, जग कैसे कविता कहता है
    सुन्दर !

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  4. बेहद खुबसूरत भाव और शब्द .........

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  5. रक्त नयन की जल धारा को,
    जग कैसे कविता कहता है

    वाह भाई वाह, क्या बात कही है?
    अब तो आपने इतने गहरे भावों की बेहतरीन कविता पढ़ा कर भी बांध दिया न हमें की इसे कविता कसे कहें.......

    बहुत बहुत ....... अब आगे भी कुछ लिखने के पहले सोचना पड़ेगा, कही इस पर भी प्रश्न चिन्ह न लग जाये?

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  6. यादों के जब दीप जलाता
    उतना ही है तम गहराता.........

    यादें तो ऐसी ही होती हैं ....... मन को तरसाती हैं ...... सुन्दर भाव और सुन्दर बोल हैं आपकी रचना के ....

    उत्तर देंहटाएं
  7. रक्त नयन की जल धारा को, जग कैसे कविता कहता है..
    बहुत खूब ..!!

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  8. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण कविता लिखा है आपने! बहुत अच्छा लगा!

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  9. रक्त नयन की जल धारा को, जग कैसे कविता कहता है
    यादों का सुन्दर चित्रण एक एक शब्द से झलकता है अ\
    रक्त नयन की जल धारा को, जग कैसे कविता कहता है
    इन शब्दों मे विरह् वेदना को कैसे जीया है सुnन्दर रचना शुभकामनायें

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  10. तिमिर बहुत गहरा होता है

    रात चाद जब नभ मे खोता
    तारों की झुरुमुट मे सोता

    मेरी भी बाहों मे कोई,अनजाना सा भय होता है
    bahut sundar

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  11. "रक्त नयन की जल धारा को, जग कैसे कविता कहता है"

    बहुत ही सुन्दर रचना . बधाई !!!

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  12. वाह अपने पुराने पुरकशिश अंदाज मे आपको देख कर फिर खुशी हुई..
    रक्त नयन की जल धारा को, जग कैसे कविता कहता है
    जग कहे न कहे मगर हम तो कविता ही कहेंगे उसे..और वो भी इतनी मधुर की दिल ले ले..बार बार गुनगुनाने को जी चाहे.

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  13. मगर बड़ा लम्बा गैप रहा इस बार..उम्मीद करता हूँ कि तबियत इसकी वजह नही रही होगी.

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  14. रात चाद जब नभ मे खोता
    तारों की झुरुमुट मे सोता

    मेरी भी बाहों मे कोई,अनजाना सा भय होता है

    वाह......!!

    रक्त नयन की जल धारा को, जग कैसे कविता कहता है

    इस पंक्ति ने तो लाजवाब कर दिया .....बहुत सुंदर रचा है विक्रम जी .....बधाई ....!!

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  15. रक्त नयन की जल धारा को, जग कैसे कविता कहता है

    Ye panktiyaan khas taur par bahut achchi lagin.Shubkamnayen.

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