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गुरुवार, 12 नवंबर 2009

कहाँ नयन मेरे रोते हैं

कहाँ नयन मेरे रोते हैं

पलक रोम में लख कुछ बूदें
या टूटे पा मेरे घरौंदे

सोच रहे हों बस इतने से ,नहीं रात भर हम सोते हैं

जो जोडा था वह तोड़ा हैं
मिथ्या सपनों को छोडा हैं

पा करके अति ख़ुशी नयन ये,कभी-कभी नम भी होते हैं

बीते पल के पीछे जाना
हैं मृग-जल से प्यास
बुझाना

खोकर जीने में भी साथी,कुछ अनजाने सुख होते हैं


vikram
[पुन:प्रकाशित ]

9 टिप्‍पणियां:

  1. कहाँ नयन मेरे रोते हैं

    पलक रोम में लख कुछ बूदें
    या टूटे पा मेरे घरौंदे

    सोच रहे हों बस इतने से ,नहीं रात भर हम सोते हैं

    जो जोडा था वह तोड़ा हैं
    मिथ्या सपनों को छोडा हैं

    पा करके अति ख़ुशी नयन ये,कभी-कभी नम भी होते हैं

    बहुत सुन्दर vikram ji , काफी दिनों बाद नजर आये !

    उत्तर देंहटाएं
  2. खोकर जीने में भी साथी,कुछ अनजाने सुख होते हैं..
    बहुत सही ...
    सुन्दर कविता ...बधाई ..!!

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  3. in panktiyon dil ko choo liya....

    जो जोडा था वह तोड़ा हैं
    मिथ्या सपनों को छोडा हैं


    baht sunder kavita hai......

    उत्तर देंहटाएं
  4. "पा करके अति ख़ुशी नयन ये,कभी-कभी नम भी होते हैं"

    बहुत ही भाव पूर्ण पंक्तियाँ है , आपको बहुत बहुत बधाई !!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. "पा करके अति ख़ुशी नयन ये,कभी-कभी नम भी होते हैं"

    बहुत ही सुंदर ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. खोकर जीने में भी साथी,कुछ अनजाने सुख होते हैं

    Bahut pate ki baat kahi aapne.

    उत्तर देंहटाएं
  7. खोकर जीने में भी साथी,कुछ अनजाने सुख होते हैं
    bahut hi achchhi rachna

    उत्तर देंहटाएं