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बुधवार, 2 जनवरी 2013

वह फिर भी अबला कहलाती......

वह फिर भी अबला कहलाती

रचना अविराम जो करती
जीवन पथ आलोकित करती

रख नयनों में नीर ,रक्त से अपने,जग को जन है देती
 वह फिर भी अबला कहलाती

निर्बल को जो बल है देती
ममता दे निर्ममता सहती

जग उसका करता है शोषण,वह जन-जन का पोषण करती
 वह फिर भी अबला कहलाती

हर रुपों में जन को सेती
माँ,बहना,भार्या बन रहती

विस्मृ्ति कर अपने दुख सारे, जगती को सुखधाम बनाती
 वह फिर भी अबला कहलाती
vikram

2 टिप्‍पणियां:

  1. विडंबना ही है, जो इतना सब करके भी अबला कहलाती है... सार्थक अभिव्यक्ति... आभार

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  2. वो अब अबला नहीं रहेगी ... उसका बहुत शिशन हो गया ...
    इस दिशा को बदलना होगा अब ...

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