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गुरुवार, 29 जनवरी 2009

मेरे हालात पर भी न, इतना रहम खाओ तुम

मेरे हालात पर भी न इतना रहम खाओ तुम

कि मुझको शर्म आजाये, दो आँसू भी गिराने में

ये गुलशन मैने सीचा था,गुलों को तुमने लूटा हैं

इन काटों को तो रहने दो,मेरा दामन चुभाने को

ये गिरना गिर के उठना, फिर से चलना खूब सीखा हैं

नजर में अपनों के गिरना,नहीं बर्दाश्त कर पाये

ये माना मैं हूँ जज्बाती,मगर इतना नहीं यारा

की सच और सब्र के दामन से,अपने को जुदा कर लूँ

vikram

3 टिप्‍पणियां:

  1. ये गुलशन मैने सीचा था,गुलों को तुमने लूटा हैं
    इन काटों को तो रहने दो,मेरा दामन चुभाने को

    वाह जी वाह बेहतरीन एक एक शेर कमाल का हे

    बहुत खूब

    फूलों से कांट अच्‍छे
    जो दामन थाम लेते हैं

    दोस्‍तों से दुश्‍मन अच्‍छे

    जो जलकर भी नाम लेते हैं

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  2. बहुत सुन्दर और प्रभावशाली रचना

    उत्तर देंहटाएं
  3. ये माना मैं हूँ जज्बाती,मगर इतना नहीं यारा

    की सच और सब्र के दामन से,अपने को जुदा कर लूँ

    वाह! बहुत खूब लिखा है विक्रम जी आप ने.

    उत्तर देंहटाएं