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शुक्रवार, 19 जून 2009

वह फिर भी ..................

वह फिर भी अबला कहलाती

रचना अविराम जो करती
जीवन पथ आलोकित करती

रख नयनों में नीर ,रक्त से अपने,जग को जन है देती

निर्बल को जो बल है देती
ममता दे निर्ममता सहती

जग उसका करता है शोषण,वह जन-जन का पोषण करती

हर रुपों में जन को सेती
माँ, बहना,भार्या बन रहती

विस्मृ्ति कर अपने दुख सारे, जगती को सुखधाम बनाती
vikram

6 टिप्‍पणियां:

  1. "जग उसका करता है शोषण,वह जन-जन का पोषण करती"
    ऐसी कालजयी पंक्ति रचने पर बारम्बार बधाई...बेहद प्रभावशील रचना...
    नीरज

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  2. निर्बल को जो बल है देती
    ममता दे निर्ममता सहती

    बहुत ही सुन्दर चित्रण नारी मन की ............एक खुबसूरत कविता

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  3. निर्बल को जो सबला बनाना है, साथ सबल को देना होगा...
    अबला के सबल रूप को, जन-जन को स्वीकारना होगा...
    जैसे आप ने बात मानी है, हर पुरुष यह समझ ले तो, फिर
    इस जग में अबला को कोइ दर्द न होगा.

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  4. बहुत सुन्दर रचना और भाव!
    घुघूती बासूती

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  5. आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद
    विक्रम

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