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शुक्रवार, 26 जून 2009

हे प्रभात तेरा अभिनंदन

हे प्रभात तेरा अभिनंदन

किरण भोर की, निकल क्षितिज से
उलझी ओस कणों के तन से

फूलों की क्यारी तब उसको, देती अपना मौन निमंत्रण

भौरों के स्वर हुये गुंजरित
खग-शावक भी हुए प्रफुल्लित

श्यामा भी अपनी तानों से,करती जैसे रवि का पूजन

ज्योति-दान नव पल्लव पाया
तम की नष्ट हुयी हैं काया


गोदी में गूजी किलकारी, करती हैं तेरा ही वंदन

विक्रम

3 टिप्‍पणियां:

  1. इमानदारी से कहूँ...आजतक आपकी लिखी जितनी भी रचनाएँ पढी,शायद ही कोई ऐसी लगी की इसे केवल पढ़ लिया जाय सहेजने की आवश्यकता नहीं...

    माँ शारदे अपना वरद कर सदा आपके मस्तक पर रखें...

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  2. रंजना जी ,बहुत बहुत धन्यवाद तथा‘नज़र’आपको को भी

    जवाब देंहटाएं