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शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

यह अतीत से कैसा बंधन.......






यह अतीत से कैसा बंधन
म्रदुल बहुत थी मेरी इच्छा

देख तुम्हारी हाय अनिच्छा
तोड़ दिये मैने ही उस क्षण,पेम-परों के सारे बंधन
यह अतीत से कैसा बंधन
मौंन ह्रदय से तुम्हे बुलाया
अपनी ही प्रतिध्वनि को पाया
मेरे भाग्य-पटल पर अंकित,उस क्षण के तेरे उर क्रंदन
यह अतीत से कैसा बंधन
चिर-अभाव में आज समाया
कैसी परवशता की छाया
यादों की इस मेह-लहर का,क्यूँ करता हूँ मै अभिनंदन
यह अतीत से कैसा बंधन
vikram [पुन:प्रकाशित]

3 टिप्‍पणियां:

  1. namaskar sir .diwali ki apko shubhkamna badi sunder rachana hai apki acha laga padhker

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  2. देख तुम्हारी हाय अनिच्छा
    तोड़ दिये मैने ही उस क्षण,पेम-परों के सारे बंधन
    सुन्दर अभिव्यक्ति

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  3. देख तुम्हारी हाय अनिच्छा
    तोड़ दिये मैने ही उस क्षण,पेम-परों के सारे बंधन
    सुंदर भावाव्यक्ति अच्छी लगी

    उत्तर देंहटाएं