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गुरुवार, 11 नवंबर 2010

मै चुप हूँ......

 मै चुप हूँ
ढूढता है तू
बन व्रतचारी
हिम शिखर में
स्वंम सिध्द मंत्रो की साधना से
मै चुप हूँ
श्रध्दा के ज्वार में
निर्माण करता है मेरे रूपों का

स्थानों का
मै चुप हूँ
अणु-अणु में खोजता है
उत्पत्ति के रहस्य
मै चुप हूँ
खुद को मान बैठता है
सर्व शक्तिमान
मै चुप हूँ
गिडगिडाता है
प्राणों के एक बुलबुले के लिए
मै चुप हूँ
सम्पूर्ण गतियों,प्रवाहों को

समझने की
तेरी
लालसा
मै चुप हूँ
देख तुम्हारी
श्रध्दा
कृतज्ञता
परिताप
मै चुप हूँ
जानता हूँ
तुम एक अंग हो
मेरे चेतन अवस्था के
जो
चलेगा निरंतर
मेरी अवचेतना तक
नई चेतना के लिए
मै चुप हूँ
विक्रम
[पुन:प्रकाशित]

2 टिप्‍पणियां:

  1. waah ! kya baat hai, chhup rah kar bhi kitna kuch kah gaye aap....:)

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  2. चुप रह कर सब कह दिया ,पूर्ण सच के स्वरूप का दर्शन कराती सुन्दर कविता

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