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शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

आज रात कुछ थमी-थमी सी

आज रात कुछ थमी-थमी सी

स्वप्न न जानें कैसे भटके
नयनों की कोरो से छलके

दूर स्वान की स्वर भेदी से ,हर आशाये डरी-डरी सी

दर्दो का वह उडनखटोला
ले कर मेरे मन को डोला

स्याह रात की जल-धरा से ,मेरी गागर भरी-भरी सी

शंकाओ का कसता धेरा
कैसा होगा मेरा सवेरा

मंजिल के सिरहाने पर ये ,राहें कैसी बटी-बटी सी

विक्रम

5 टिप्‍पणियां:

  1. शंकाओ का कसता धेरा
    कैसा होगा मेरा सवेरा

    मंजिल के सिरहाने पर ये ,राहें कैसी बटी-बटी सी
    Bahut sundar!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही सटीक भाव..बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    शुक्रिया ..इतना उम्दा लिखने के लिए !!

    उत्तर देंहटाएं