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शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

आ साथी, अब दीप जलाएँ......


आ साथी, अब दीप जलाएँ
 
लगी  निशा  होने  है, गहरी
घोर तिमिर होगा अब प्रहरी

अपनी अभिलाषाओं को फिर से,निंद्रा-पथ की राह दिखाएँ

आ साथी, अब दीप जलाएँ

है  पावस  की  रात अँधेरी
घन-बूँदों की सुन कर लोरी

शायद  नीड़- नयन में लौटे,हमसे  रुठी  कुछ  आशाएँ

आ साथी,अब दीप जलाएँ

आयेगी उषा  की लाली
नही रात ये रहने वाली

दीपशिखा की इस झिलमिल में,हम सपनों के महल सजाएँ

आ साथी,अब दीप जलाएँ
vikram

5 टिप्‍पणियां:

  1. अंधकार को बुझाना है
    जीवन में खुशिया लाना है
    दीप को जलाना है
    सकारात्मक सोच व्यक्त करती
    सुन्दर रचना:-)

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  2. अनुपम भाव उत्‍कृष्‍ट लेखन ...आभार

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  3. भावपूर्ण अनुपम अभिव्यक्ति..

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  4. सुन्दर रचना
    कान्हा जी के जन्मदिवस की हार्दिक बधाइयां !!!

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