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मंगलवार, 5 अगस्त 2025

शिव तांडव चेतन्यस्तोत्रम्

 शिव तांडव चेतन्यस्तोत्रम्

🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷

प्रस्तावना


🙏ॐ नमः शिवाय 🙏  


हे नटराज, विश्वचेतन्यनायक, चिदानंदघन शंभु!

यस्य तांडवेन विश्वं नादति, चेतन्यलयेन संनादति, तेजसा प्रकम्पति।यो भक्त्या प्रकृतिं शान्तये लयति, विश्वं सौहार्देन सिद्धति।तं नमामि शिवं परं, सत्यं सुंदरं मोक्षप्रकाशकम्। 


 श्लोक १

नादति विश्वं यस्य तांडवे चेतन्यलयेन शान्तिमत्,

नक्षत्रसहस्रदीप्तौ नृत्यति विश्वनायकः सनातनः।

धिमितधिमितनादति डमरुः त्रिनेत्रः तेजसा प्रकम्पति,

प्रणमामि शंभुं हृदये सदा चिदानंदप्रकाशकम्॥ 


 श्लोक २

प्रकृतिसंनादति यस्य नृत्ये विश्वं शान्तये लयति,

सूर्यसहस्रतेजसि चिदानंदं सर्वं प्रकम्पति सदा।

स्फुरति भुजङ्गमालया कृपाकटाक्षेन विश्वं संनादति,

ध्यायामि शंभुं परमं रम्यं सर्वसिद्धिप्रदायिनम्॥  


श्लोक ३

नीलकण्ठः पशुपतिः स्मितचन्द्रशेखरः सनातनः,

सर्वसाक्षी महायोगी विश्वं यस्य तेजसि नृत्यति।

धिमिद्धिमिद्धिमिर्नादति मृदङ्गं तांडवे प्रभोः सदा,

नमामि शंभुं हृदये रम्यं विश्वचक्रनायकं परम्॥ 


 श्लोक ४

गङ्गातरङ्गसङ्काशं जटाजूटं स्फुरति यस्य शीर्षे,

कुहूसहस्रकान्तौ शशांकवत् स्मितचन्द्रशेखरः परम्।

नादति विश्वं यस्य शक्त्या चेतन्यं सर्वं संनादति,

प्रणमामि शंभुं सदा रम्यं मोक्षगतिप्रदायिनम्॥ 

 श्लोक ५

सृष्टिसंनादति यस्य तांडवे संहारः शान्तये लयति,

विज्ञानचेतन्यलयेन विश्वं शान्तं सर्वं प्रकाशति।

स्फुरति पिनाकहस्तः कामहन्ता सर्वलोकसुखंकरः,

ध्यायामि शंभुं परमं सदा सर्वसिद्धिप्रदायिनम्॥

  श्लोक ६

कपालमालाधरः कैलासे स्मितार्धेन्दुशेखरः सनातनः,

हलाहलं कण्ठगतं धृतं येन विश्वं रक्षति परम्।

धिमितधिमितनादति तांडवे विश्वं प्रकम्पति सदा,

नमामि शंभुं हृदये रम्यं चिदानंदप्रकाशकम्॥ 

 श्लोक ७

सर्वं विश्वं यस्य शक्त्या चेतन्यलयेन संनादति,

अद्वैतं परमं शिवं यदङ्घ्रौ विश्वं नृत्यति सदा।

कृपासमुद्रं विश्वनाथं सहस्रनामं सनातनम्,

प्रणमामि शंभुं सदा रम्यं सर्वसिद्धिप्रदायिनम्॥

  श्लोक ८

नवीनमेघमण्डलीसङ्काशं नीलकण्ठं सनातनम्,

स्फुरति सर्वं यस्य तांडवे चेतन्यं विश्वं प्रकाशति।

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं गजच्छिदं तमन्तकान्तकम्,

नमामि शंभुं परमं सदा मोक्षगतिप्रदायिनम्॥

  श्लोक ९

वृषध्वजः परशुहस्तः कैलासे स्मितचन्द्रशेखरः,

सर्पालङ्कारो भस्मलिप्तः सर्वसाक्षी महायोगी।

यस्य शक्त्या विश्वं संनादति चेतन्यं प्रकाशति सदा,

ध्यायामि शंभुं हृदये रम्यं सर्वसिद्धिप्रदायिनम्॥ 

 श्लोक १०

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरीसङ्काशम्,

रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणं विश्वं नृत्यति यस्य शक्त्या।

त्रिलोकीनाथः पशुपतिः स्मितार्धेन्दुशेखरः सनातनः,

प्रणमामि शंभुं हृदये सदा चिदानंदप्रकाशकम्॥

  श्लोक ११

स्फुरति शीर्षे शशांकः डमरुं नादति यः प्रभुरुग्रः,

अर्धनारीश्वरं शक्तिशिवं संनादति परं यत्।

कृपासमुद्रं विश्वरक्षी यस्य तेजसि विश्वं लयति,

नमामि शंभुं सदा रम्यं सत्यं परं चिदानंदम्॥  

श्लोक १२

सद्योजातः विश्वकर्ता पञ्चवक्त्रः सनातनः,

कामारिः त्रिनेत्रधारी भस्मलिप्तः कृपानिधिः।

नृत्यति यस्य शक्त्या विश्वं संनादति प्रकाशति,

ध्यायामि शंभुं परमं हृदये मोक्षगतिप्रदायिनम्॥ 

 श्लोक १३

यदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्,

विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।

शिवेति मन्त्रमुच्चरन् सुखी भवामि सर्वदा,

नमामि शंभुं विश्वनाथं मोक्षगतिप्रदायिनम्॥ 

 श्लोक १४

यस्य तांडवेन विश्वं प्रकम्पति चिदानंदरूपम्,

शिवः शंभुः पशुपतिः सर्वं यत्र संनादति लीनति।

कृपासमुद्रं विश्वनाथं सहस्रनामं सनातनम्,

प्रणमामि शंभुं हृदये सदा सर्वसिद्धिप्रदायिनम्॥

  श्लोक १५

नमामि तं विश्वकर्तारं सत्यं शिवं सुंदरं परम्,

यस्य तेजसि विश्वं संनादति चेतन्यलयेन शान्तिमत्।

सर्वं यत्र लयति शान्तये भक्तिज्ञानवैराग्यदायिनम्,

प्रणमामि शंभुं सदा रम्यं मोक्षप्रकाशकं परम्॥  


फलश्रुतियः 

शिवतांडवं रम्यं चिदानंदमयं स्तवम् पठति,

स लभति शान्तिं सिद्धिं ज्ञानं विश्वसौहार्दं सनातनम्।

शिवे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिम्,

प्रणमामि शंभुं सदा रम्यं सर्वं सिद्धिप्रकाशकम्॥  


*इति विक्रमसिंहकृते शिवताण्डवचेतन्यस्तोत्रम् समाप्तम् *


विक्रम सिंह

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शिव तांडव चेतन्यस्तोत्रम्


हिंदी रूपांतरण  

प्रस्तावना  

 ॐ नमः शिवाय 

  हे नटराज, विश्व की चेतना के नायक, चिदानंद से परिपूर्ण शंभु!जिनके तांडव से विश्व नाद करता है, चेतना के लय में संनादता है, और तेज से कंपित होता है। जो भक्ति से प्रकृति को शांति प्रदान करते हैं और विश्व को सौहार्द से सिद्ध करते हैं।उस परम शिव को मैं प्रणाम करता हूँ, जो सत्य, सुंदर और मोक्ष का प्रकाशक है। 

 श्लोक १

जिनके तांडव से विश्व नाद करता है, चेतना के लय में शांति प्राप्त करता है,सहस्त्रों नक्षत्रों की दीप्ति में सनातन विश्वनायक नृत्य करते हैं।डमरु धिमि-धिमि नाद करता है, त्रिनेत्री शिव अपने तेज से विश्व को कंपित करते हैं,मैं हृदय में सदा

चिदानंद प्रकाशक शंभु को प्रणाम करता हूँ। 

 श्लोक २

जिनके नृत्य से प्रकृति संनादती है, विश्व शांति के लिए लय में विलीन होता है,हजार सूर्यों के तेज में चिदानंद से सब कुछ सदा कंपित होता है।सर्पमाला से सुशोभित,कृपा दृष्टि से विश्व संनादता है,मैं परम रमणीय,सर्वसिद्धि प्रदान करने वाले शंभु का ध्यान करता हूँ। 

 श्लोक ३

नीलकंठ, पशुपति, मुस्कुराते चंद्रशेखर, सनातन,

सर्वसाक्षी, महायोगी, जिनके तेज में विश्व नृत्य करता है।

मृदंग धिमि-धिमि नाद करता है, प्रभु के तांडव में सदा,

मैं हृदय में विश्वचक्र के नायक, रमणीय शंभु को नमस्कार करता हूँ।  

श्लोक ४

गंगा की तरंगों-सा जटाजूट जिनके सिर पर शोभयमान है,

हजारों चंद्रमा की कांति में मुस्कुराते चंद्रशेखर परम हैं।

जिनकी शक्ति से विश्व नाद करता है, चेतना सर्वत्र संनादती है,मैं सदा रमणीय, मोक्ष प्रदान करने वाले शंभु को प्रणा

करता हूँ।

  श्लोक ५

जिनके तांडव से सृष्टि संनादती है, संहार शांति के लिए लय करता है,विज्ञान और चेतना के लय से विश्व शांत और प्रकाशित होता है।पिनाकधारी, काम का नाश करने वाले, सभी लोकों को सुख देने वाले,मैं सदा परम, सर्वसिद्धि प्रदान करने वाले शंभु का ध्यान करता हूँ।  

श्लोक ६

कपालमाला धारण करने वाले, कैलास में अर्धचंद्र से सुशोभित सनातन,जिन्होंने हलाहल विष कंठ में धारण कर विश्व की रक्षा की।तांडव में धिमि-धिमि नाद करता विश्व सदा कंपित होता है,मैं हृदय में रमणीय, चिदानंद प्रकाशक शंभु को नमस्कार करता हूँ।

  श्लोक ७

जिनकी शक्ति से विश्व चेतना के लय में संनादता है,

अद्वैत परम शिव, जिनके चरणों में विश्व सदा नृत्य करता है।

कृपा के सागर, विश्वनाथ, सहस्रनाम वाले सनातन,

मैं सदा रमणीय, सर्वसिद्धि प्रदान करने वाले शंभु को प्रणाम करता हूँ। 

 श्लोक ८

नवीन मेघों-सी आभा वाले नीलकंठ, सनातन,

जिनके तांडव से चेतना में विश्व प्रकाशित होता है।

स्मर, पुर, गज और मृत्यु का अंत करने वाले,

मैं सदा परम, मोक्ष प्रदान करने वाले शंभु को नमस्कार करता हूँ।  

श्लोक ९

वृषभ ध्वज वाले, परशुधारी, कैलास में मुस्कुराते चंद्रशेखर,

सर्पों से अलंकृत, भस्म से लिप्त, सर्वसाक्षी, महायोगी।

जिनकी शक्ति से विश्व संनादता है, चेतना सदा प्रकाशित होती है,मैं हृदय में रमणीय, सर्वसिद्धि प्रदान करने वाले शंभु का ध्यान करता हूँ।  

श्लोक १०

सर्वमंगलमयी कला-कदंब की मंजरी-से शोभायमान,

रस और माधुर्य के प्रवाह से विश्व उनकी शक्ति से नृत्य करता है।त्रिलोक के नाथ, पशुपति, अर्धचंद्र से सुशोभित सनातन,

मैं हृदय में सदा चिदानंद प्रकाशक शंभु को प्रणाम करता हूँ। 

 श्लोक ११

जिनके सिर पर चंद्रमा शोभित है, डमरु नाद करता है,

उग्रप्रभु,अर्धनारीश्वर, शक्ति और शिव का परम संनाद,

कृपा के सागर, विश्व रक्षक, जिनके तेज में विश्व लय होता है,

मैं सदा रमणीय, सत्य, परम चिदानंद शंभु को नमस्कार करता हूँ।  

श्लोक १२

सद्योजात, विश्व के कर्ता, पंचमुखी, सनातन,

काम के शत्रु, त्रिनेत्रधारी, भस्मलिप्त, कृपा के भंडार।

जिनकी शक्ति से विश्व नृत्य करता और प्रकाशित होता है,

मैं हृदय में परम, मोक्ष प्रदान करने वाले शंभु का ध्यान करता हूँ। 

 श्लोक १३

जब मैं नदियों और जंगलों के किनारे निवास करता हूँ,

दुर्मति से मुक्त होकर सदा सिर पर अंजलि धारण करता हूँ।

‘शिव’ मंत्र का उच्चारण कर सदा सुखी हो जाता हूँ,

मैं विश्वनाथ, मोक्ष प्रदान करने वाले शंभु को नमस्कार करता हूँ।  

श्लोक १४

जिनके तांडव से विश्व कंपित होता है, चिदानंद रूप में,

शिव, शंभु, पशुपति, जहाँ सब कुछ संनादता और लीन होता है। कृपा के सागर, विश्वनाथ, सहस्रनाम वाले सनातन,

मैं हृदय में सदा रमणीय, सर्वसिद्धि प्रदान करने वाले शंभु को प्रणाम करता हूँ।  

श्लोक १५

मैं विश्व के कर्ता, सत्य, शिव, सुंदर, परम को नमस्कार करता हूँ,जिनके तेज में विश्व चेतना के लय से संनादता और शांत होता है।जहाँ सब कुछ शांति के लिए लय करता है, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य देने वाले,मैं सदा रमणीय, मोक्ष प्रकाशक परम शंभु को प्रणाम करता हूँ।  

फलश्रुति

जो इस रमणीय, चिदानंदमय शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करता है,वह शांति, सिद्धि, ज्ञान और विश्व में सौहार्द प्राप्त करता है।शिव और गुरु में भक्ति से शीघ्र ही वह उत्तम गति पाता है,मैं सदा रमणीय, सर्वसिद्धि प्रकाशक शंभु को प्रणाम करता हूँ।


  इति विक्रम सिंह द्वारा रचित शिव तांडव चेतन्यस्तोत्रम्

समाप्त।  

विक्रम सिंह

🌺 नृत्यचन्द्रामृतस्तोत्रम् 🌺 समर्पण छंद *********** ॐ नमो महाकालाय, विश्वनाथाय शङ्करम्। नादचन्द्रामृतं नृत्यं, भक्त्या समर्पयाम्यहम्॥ कालचक्रप्रवर्तकं, चिदानन्दस्वरूपिणम्। महाकालेश्वरं नौमि, हृदा सर्वं समर्पितम्॥ 🙏 🪷नृत्यचन्द्रामृतस्तोत्रम् 🪷 प्रस्तावना ॐ नमः शिवाय। हे नृत्यचन्द्रामृतचक्र, चिद्ज्योतिस्स्फुरण, विश्वसङ्गीतनायक! यस्य ताण्डवेन विश्वं प्रनादति, प्रलयाग्निना प्रज्वलति, चेतन्यामृतेन शान्तति। तं प्रणमामि परं शिवं, सत्यं शिवं सुन्दरं, मोक्षचन्द्रप्रकाशकं नटराजम्॥ नृत्यचन्द्रामृतस्तोत्रम् श्लोक १ जटावनान्तगङ्गातरङ्गसङ्कीर्णनादस्फुरति, चन्द्रकान्तिमौलिः शम्भुज्योत्या विश्वं प्रदीपति। टङ्टकटङ्टकन्नादति डमरुणा सङ्गर्जति, नृत्यचन्द्रामृतचक्रं प्रणमामि नटराजम्॥ श्लोक २ नीलकण्ठदीप्तिः कृपासिन्धु हालाहलं बिभर्ति, शशाङ्कमौलिः शक्तिनादेन विश्वं प्रनादति। प्रलयाग्निचक्रं चिद्ज्योतिषा शान्तये प्रज्वलति, चिदानन्दरूपं शम्भुं प्रणमामि नटराजम्॥ श्लोक ३ कपालहारकण्ठः शूली शक्तिसङ्गर्जति नादति, सर्पजटया विश्वं कालाग्निना प्रज्वलति। नादब्रह्मरूपी पञ्चकृत्यं प्रचण्डति ताण्डवेन, मोक्षदं शम्भुं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥ श्लोक ४ पिनाकहस्तः त्रिलोकीशः प्रलयाग्निना नृत्यति, सहस्रार्कनेत्रं सूर्यवत् समुद्रं प्रज्वालति। चेतन्यनादेन विश्वं शम्भुशक्त्या प्रदीपति, नृत्यचन्द्रामृतचक्रं प्रणमामि नटराजम्॥ श्लोक ५ हिमशिखरे डमरुध्वनिना विश्वं सङ्गर्जति तेजसा, भस्मरागाङ्गः सर्पहारः त्रिपुरं प्रचण्डति। चिदानन्दरूपी नादसङ्घट्टेन शान्तये नादति, योगिगम्यं शम्भुं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥ श्लोक ६ वीणारवसङ्कीर्णनादेन यथा समुद्रः सङ्गर्जति, अर्धनारीश्वरः शक्तिशिवं चेतन्यप्रकाशति। नृत्येन यस्य सर्वं कृपया शान्तये सङ्नादति, विश्वनादनायकं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥ श्लोक ७ त्रिशूलहस्तः विश्वकर्ता सहस्रनाम्ना सङ्गर्जति, प्रलयकाले चेतन्येन अघोररूपेण प्रचण्डति। नृत्यति यस्य प्रभावेन कालचक्रं प्रदीपति, सृष्टिकर्तारं शम्भुं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥ श्लोक ८ कैलासशृङ्गे स्मरहन्ता सर्पजटया सङ्गर्जति, प्रलयाग्निनृत्येन सर्वं चेतन्येन शान्तये। चिद्घनानन्दरूपी यः कृपया तेजसा प्रज्वलति, सर्वसिद्धिप्रदं शम्भुं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥ श्लोक ९.१ गङ्गातरङ्गसङ्कीर्णजटया यथा सिन्धुर्नादति, शक्तिसङ्घट्टवह्निना विश्वं त्रिलोकी प्रचण्डति। चेतन्यचन्द्रदीप्त्या शम्भुः कृपया सङ्गर्जति, नृत्यचन्द्रामृतचक्रं प्रणमामि नटराजम्॥ श्लोक ९.२ नृत्येन यस्य विश्वं शान्तं तेजसा सनातनम्, कालचक्रवह्निना चेतन्यामृतं प्रदीपति। मोक्षमार्गप्रकाशकं शम्भुं सङ्गीतति भक्तितः, नृत्यचन्द्रामृतचक्रं प्रणमामि नटराजम्॥ श्लोक १० सद्योजातः पञ्चवक्त्रः नादब्रह्मणा सङ्गर्जति, भस्मरागः स्मरहन्ता चेतन्येन प्रज्वालति। नृत्यति यस्य प्रभावेन सृष्टिलयं सनातनम्, चेतन्यनायकं शम्भुं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥ फलश्रुति यः पठति भक्त्या ताण्डवं नादब्रह्मसङ्गीतं विद्वान्, स लभति मुक्तिं सिद्धिं विश्वसौहार्दं चेतन्यामृतम्। नृत्यति यस्य प्रभावेन सर्वं मोक्षमार्गे नादति, चिदानन्दरूपं शम्भुं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥ *इति विक्रमसिंहकृते नृत्यचन्द्रामृतस्तोत्रम् समाप्तम् * विक्रम सिंह ******************************* ******************************* नृत्यचंद्रामृत स्तोत्र: भावार्थ समर्पण छंद महाकाल, विश्वनाथ, शंकर को प्रणाम! भक्ति के साथ मैं नाद और नृत्य का अमृत अर्पित करता हूँ। वे काल को नचाने वाले, चेतना और आनंद के सागर हैं। हृदय से सब कुछ उनके चरणों में समर्पित है। प्रस्तावना ॐ नमः शिवाय। हे नृत्यचंद्रामृत चक्र, चेतना की अनंत ज्योति! आप विश्व के संगीत के नायक हैं। आपके तांडव से सृष्टि गूंजती है, प्रलय की अग्नि प्रज्वलित होती है, और चेतना का अमृत शांति बरसाता है। सत्य, शिव, सुंदर, मोक्ष के चंद्रमा को प्रणाम, नटराज को नमस्कार। श्लोक १ गंगा की लहरें शिव की जटाओं में नाद का सागर रचती हैं। चंद्रमा की शीतल कांति से उनका मस्तक विश्व को आलोकित करता है। डमरू की टंकार सृष्टि के कण-कण में जीवन का संगीत भर देती है। नृत्य का यह अमृत चक्र नटराज में साकार है। श्लोक २ नीलकंठ की ज्योति कृपा का समुद्र है, जो विष को अमृत में बदल देती है। शक्ति का नाद विश्व को संगीतमय करता है। प्रलय की अग्नि उनके नृत्य में चेतना की शांति बनकर उभरती है। यह आनंदमय तांडव सृष्टि को प्रदीप्त और शांत करता है। श्लोक ३ कपालमाला और त्रिशूल से युक्त शिव शक्ति के नाद से गूंजते हैं। सर्पों से सजी जटाएँ काल की अग्नि को भड़काती हैं। उनका तांडव सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव, और अनुग्रह का प्रचंड स्वरूप है। यह नृत्य मोक्ष का द्वार खोलता है। श्लोक ४ पिनाकधारी त्रिलोकनाथ प्रलय की अग्नि में नृत्य करते हैं। सहस्र सूर्यों सा उनका तेज समुद्र को प्रज्वलित करता है। चेतना का नाद उनकी शक्ति से विश्व को रोशन करता है। यह नृत्य अमृत का चक्र है, जो सृष्टि को जीवन देता है। श्लोक ५ हिमशिखर पर डमरू का नाद विश्व को तेज से गूंजायमान करता है। भस्म से सजा शरीर, सर्पों का हार, त्रिपुर को भस्म करता है। चेतना का आनंद नाद से शांति की ओर ले जाता है। योगियों के स्वामी का यह नृत्य मोक्ष का मार्ग है। श्लोक ६ अर्धनारीश्वर शिव शक्ति और चेतना की एकता हैं। वीणा का राग सागर-सा गूंजता है, विश्व को प्रकाशित करता है। उनका नृत्य कृपा से शांति का संगीत रचता है। विश्व के नादनायक का यह अमृतमय चक्र सृष्टि को जोड़ता है। श्लोक ७ त्रिशूलधारी विश्वकर्ता सहस्र नामों से गूंजते हैं। प्रलय में उनका अघोर रूप चेतना को प्रचंड करता है। नृत्य से कालचक्र प्रदीप्त होता है, सृष्टि सनातन हो उठती है। यह तांडव विश्व का आधार है। श्लोक ८ कैलास पर स्मरहंता सर्पजटाओं से संनादते हैं। प्रलय की अग्नि उनके नृत्य में शांति बनती है। चिदानंद का तेज कृपा से विश्व को सिद्धि देता है। यह नृत्य सृष्टि को आनंद से नहलाता है। श्लोक ९.१ गंगा की लहरों से सजी जटाएँ सागर-सा नाद रचती हैं। शक्ति और अग्नि का संनाद त्रिलोक को प्रचंड करता है। चेतना का चंद्रमा शिव की कृपा से विश्व को आलोकित करता है। यह नृत्य अमृत का चक्र है। श्लोक ९.२ शिव का नृत्य विश्व को शांति और सनातन तेज से प्रदीप्त करता है। कालचक्र में चेतना का अमृत प्रज्वलित होता है। भक्ति से गूंजता यह तांडव मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। श्लोक १० पंचमुखी शिव नादब्रह्म ह नृत्यचंद्रामृत स्तोत्र

 🌺 नृत्यचन्द्रामृतस्तोत्रम्  🌺


समर्पण छंद

***********

ॐ नमो महाकालाय, विश्वनाथाय शङ्करम्।

नादचन्द्रामृतं नृत्यं, भक्त्या समर्पयाम्यहम्॥

कालचक्रप्रवर्तकं, चिदानन्दस्वरूपिणम्।

महाकालेश्वरं नौमि, हृदा सर्वं समर्पितम्॥

                  🙏


🪷नृत्यचन्द्रामृतस्तोत्रम् 🪷


 प्रस्तावना

ॐ नमः शिवाय।

हे नृत्यचन्द्रामृतचक्र, चिद्ज्योतिस्स्फुरण, विश्वसङ्गीतनायक!

यस्य ताण्डवेन विश्वं प्रनादति, प्रलयाग्निना प्रज्वलति, चेतन्यामृतेन शान्तति।

तं प्रणमामि परं शिवं, सत्यं शिवं सुन्दरं, मोक्षचन्द्रप्रकाशकं नटराजम्॥


 नृत्यचन्द्रामृतस्तोत्रम्

श्लोक १

जटावनान्तगङ्गातरङ्गसङ्कीर्णनादस्फुरति,

चन्द्रकान्तिमौलिः शम्भुज्योत्या विश्वं प्रदीपति।

टङ्टकटङ्टकन्नादति डमरुणा सङ्गर्जति,

नृत्यचन्द्रामृतचक्रं प्रणमामि नटराजम्॥  


 श्लोक २

नीलकण्ठदीप्तिः कृपासिन्धु हालाहलं बिभर्ति,

शशाङ्कमौलिः शक्तिनादेन विश्वं प्रनादति।

प्रलयाग्निचक्रं चिद्ज्योतिषा शान्तये प्रज्वलति,

चिदानन्दरूपं शम्भुं प्रणमामि नटराजम्॥  


 श्लोक ३

कपालहारकण्ठः शूली शक्तिसङ्गर्जति नादति,

सर्पजटया विश्वं कालाग्निना प्रज्वलति।

नादब्रह्मरूपी पञ्चकृत्यं प्रचण्डति ताण्डवेन,

मोक्षदं शम्भुं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥  


श्लोक ४

पिनाकहस्तः त्रिलोकीशः प्रलयाग्निना नृत्यति,

सहस्रार्कनेत्रं सूर्यवत् समुद्रं प्रज्वालति।

चेतन्यनादेन विश्वं शम्भुशक्त्या प्रदीपति,

नृत्यचन्द्रामृतचक्रं प्रणमामि नटराजम्॥ 


 श्लोक ५

हिमशिखरे डमरुध्वनिना विश्वं सङ्गर्जति तेजसा,

भस्मरागाङ्गः सर्पहारः त्रिपुरं प्रचण्डति।

चिदानन्दरूपी नादसङ्घट्टेन शान्तये नादति,

योगिगम्यं शम्भुं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥


  श्लोक ६

वीणारवसङ्कीर्णनादेन यथा समुद्रः सङ्गर्जति,

अर्धनारीश्वरः शक्तिशिवं चेतन्यप्रकाशति।

नृत्येन यस्य सर्वं कृपया शान्तये सङ्नादति,

विश्वनादनायकं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥


 श्लोक ७

त्रिशूलहस्तः विश्वकर्ता सहस्रनाम्ना सङ्गर्जति,

प्रलयकाले चेतन्येन अघोररूपेण प्रचण्डति।

नृत्यति यस्य प्रभावेन कालचक्रं प्रदीपति,

सृष्टिकर्तारं शम्भुं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥


  श्लोक ८

कैलासशृङ्गे स्मरहन्ता सर्पजटया सङ्गर्जति,

प्रलयाग्निनृत्येन सर्वं चेतन्येन शान्तये।

चिद्घनानन्दरूपी यः कृपया तेजसा प्रज्वलति,

सर्वसिद्धिप्रदं शम्भुं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥


श्लोक ९.१

गङ्गातरङ्गसङ्कीर्णजटया यथा सिन्धुर्नादति,

शक्तिसङ्घट्टवह्निना विश्वं त्रिलोकी प्रचण्डति।

चेतन्यचन्द्रदीप्त्या शम्भुः कृपया सङ्गर्जति,

नृत्यचन्द्रामृतचक्रं प्रणमामि नटराजम्॥  


 श्लोक ९.२

नृत्येन यस्य विश्वं शान्तं तेजसा सनातनम्,

कालचक्रवह्निना चेतन्यामृतं प्रदीपति।

मोक्षमार्गप्रकाशकं शम्भुं सङ्गीतति भक्तितः,

नृत्यचन्द्रामृतचक्रं प्रणमामि नटराजम्॥  


  श्लोक १०

सद्योजातः पञ्चवक्त्रः नादब्रह्मणा सङ्गर्जति,

भस्मरागः स्मरहन्ता चेतन्येन प्रज्वालति।

नृत्यति यस्य प्रभावेन सृष्टिलयं सनातनम्,

चेतन्यनायकं शम्भुं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥


 फलश्रुति

यः पठति भक्त्या ताण्डवं नादब्रह्मसङ्गीतं विद्वान्,

स लभति मुक्तिं सिद्धिं विश्वसौहार्दं चेतन्यामृतम्।

नृत्यति यस्य प्रभावेन सर्वं मोक्षमार्गे नादति,

चिदानन्दरूपं शम्भुं नृत्यचन्द्रामृतचक्रं नटराजम्॥


*इति विक्रमसिंहकृते नृत्यचन्द्रामृतस्तोत्रम् समाप्तम् *


विक्रम सिंह

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नृत्यचंद्रामृत स्तोत्र:

 भावार्थ   

समर्पण छंद

महाकाल, विश्वनाथ, शंकर को प्रणाम! भक्ति के साथ मैं नाद और नृत्य का अमृत अर्पित करता हूँ। वे काल को नचाने वाले, चेतना और आनंद के सागर हैं। हृदय से सब कुछ उनके चरणों में समर्पित है।  

प्रस्तावना

ॐ नमः शिवाय।

 हे नृत्यचंद्रामृत चक्र, चेतना की अनंत ज्योति! आप विश्व के संगीत के नायक हैं। आपके तांडव से सृष्टि गूंजती है, प्रलय की अग्नि प्रज्वलित होती है, और चेतना का अमृत शांति बरसाता है। सत्य, शिव, सुंदर, मोक्ष के चंद्रमा को प्रणाम, नटराज को नमस्कार। 

 श्लोक १

गंगा की लहरें शिव की जटाओं में नाद का सागर रचती हैं। चंद्रमा की शीतल कांति से उनका मस्तक विश्व को आलोकित करता है। डमरू की टंकार सृष्टि के कण-कण में जीवन का संगीत भर देती है। नृत्य का यह अमृत चक्र नटराज में साकार है।  

श्लोक २

नीलकंठ की ज्योति कृपा का समुद्र है, जो विष को अमृत में बदल देती है। शक्ति का नाद विश्व को संगीतमय करता है। प्रलय की अग्नि उनके नृत्य में चेतना की शांति बनकर उभरती है। यह आनंदमय तांडव सृष्टि को प्रदीप्त और शांत करता है।  श्लोक ३

कपालमाला और त्रिशूल से युक्त शिव शक्ति के नाद से गूंजते हैं। सर्पों से सजी जटाएँ काल की अग्नि को भड़काती हैं। उनका तांडव सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव, और अनुग्रह का प्रचंड स्वरूप है। यह नृत्य मोक्ष का द्वार खोलता है। 

 श्लोक ४

पिनाकधारी त्रिलोकनाथ प्रलय की अग्नि में नृत्य करते हैं। सहस्र सूर्यों सा उनका तेज समुद्र को प्रज्वलित करता है। चेतना का नाद उनकी शक्ति से विश्व को रोशन करता है। यह नृत्य अमृत का चक्र है, जो सृष्टि को जीवन देता है। 

 श्लोक ५

हिमशिखर पर डमरू का नाद विश्व को तेज से गूंजायमान करता है। भस्म से सजा शरीर, सर्पों का हार, त्रिपुर को भस्म करता है। चेतना का आनंद नाद से शांति की ओर ले जाता है। योगियों के स्वामी का यह नृत्य मोक्ष का मार्ग है। 

 श्लोक ६

अर्धनारीश्वर शिव शक्ति और चेतना की एकता हैं। वीणा का राग सागर-सा गूंजता है, विश्व को प्रकाशित करता है। उनका नृत्य कृपा से शांति का संगीत रचता है। विश्व के नादनायक का यह अमृतमय चक्र सृष्टि को जोड़ता है।  

श्लोक ७

त्रिशूलधारी विश्वकर्ता सहस्र नामों से गूंजते हैं। प्रलय में उनका अघोर रूप चेतना को प्रचंड करता है। नृत्य से कालचक्र प्रदीप्त होता है, सृष्टि सनातन हो उठती है। यह तांडव विश्व का आधार है।  

श्लोक ८

कैलास पर स्मरहंता सर्पजटाओं से संनादते हैं। प्रलय की अग्नि उनके नृत्य में शांति बनती है। चिदानंद का तेज कृपा से विश्व को सिद्धि देता है। यह नृत्य सृष्टि को आनंद से नहलाता है।  

श्लोक ९.१

गंगा की लहरों से सजी जटाएँ सागर-सा नाद रचती हैं। शक्ति और अग्नि का संनाद त्रिलोक को प्रचंड करता है। चेतना का चंद्रमा शिव की कृपा से विश्व को आलोकित करता है। यह नृत्य अमृत का चक्र है।

  श्लोक ९.२

शिव का नृत्य विश्व को शांति और सनातन तेज से प्रदीप्त करता है। कालचक्र में चेतना का अमृत प्रज्वलित होता है। भक्ति से गूंजता यह तांडव मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

  श्लोक १०

पंचमुखी शिव नादब्रह्म हैं, भस्म से सजा उनका रूप चेतना से प्रज्वलित है। उनका नृत्य सृष्टि और लय को सनातन बनाता है। चेतना के नायक का यह अमृतमय तांडव विश्व को प्रेरित करता है।  

फलश्रुति

जो भक्ति से इस तांडव और नादब्रह्म का गान करता है, वह मुक्ति, सिद्धि, और विश्व सौहार्द पाता है। शिव का नृत्य मोक्ष के मार्ग को गूंजायमान करता है, चिदानंद का अमृत विश्व में बरसता है। 


 इति विक्रम सिंह कृत नृत्यचंद्रामृत स्तोत्र समाप्त

शनिवार, 2 अगस्त 2025

ॐ नमो नादरूप

प्रस्तावना

,ॐ नमो नादरूपाय विश्वस्य मूलकारणाय।

यद् विश्वं स्वरेन संनादति, यद् सृष्टिः मायया कम्पति, तद् नादरूपं ब्रह्मैव सनातनं समाश्रितम्। अहम्,, विनम्रहृदयेन एतद् नादस्तोत्रं विश्वस्य समक्षं समर्पयामि। एषा रचना नादस्य सनातनं स्वरूपं, प्रणवस्य (ॐ) गहनतां, वैदिकदर्शनस्य मूलं च संनादति। मम उद्देश्यः केवलं विश्वस्य स्वरात्मकं सौन्दर्यं, प्रकृतिपुरुषयोः संनादं, मायया सृष्टेः कम्पनं च शब्दरूपेण संनादितुं यत्नः। एतद् काव्यं वेदानां, उपनिषदां, आध्यात्मिकचिन्तनस्य च संनादति यद् विश्वं नादेन संनादति। श्लोकाः संस्कृतभाषायाः सौम्यतां, साहित्यस्य गाम्भीर्यं च संनादति। यथा नादः शून्यात् संजातः, तथा एषा रचना हृदयात् संनादति। अहं विनम्रतापूर्वकं पाठकानां समक्षं समर्पयामि, यद् एषा रचना विश्वस्य स्वरं हृदये संनादति।  


 प्रस्तावना


ॐ नमो नादरूप को, जो विश्व का मूल कारण है।

जिस स्वर से विश्व गूंजता है, जिस माया से सृष्टि कम्पित होती है, वह नादरूप ब्रह्म ही सनातन है। मैं, ,विनम्र हृदय से यह नादस्तोत्र विश्व के समक्ष समर्पित करता हूँ। इस रचना का उद्देश्य नाद के सनातन स्वरूप, प्रणव (ॐ) की गहनता, और वैदिक दर्शन के मूल को प्रकट करना है। मेरा प्रयास केवल विश्व के स्वरात्मक सौंदर्य, प्रकृति-पुरुष के संनाद, और माया से सृष्टि के कम्पन को शब्दों में गूंजायमान करने का है। यह काव्य वेदों, उपनिषदों, और आध्यात्मिक चिंतन के स्वर को गूंजायमान करता है। श्लोक संस्कृत भाषा की सौम्यता और साहित्य की गंभीरता को प्रकट करते हैं। जैसे नाद शून्य से प्रकट होता है, वैसे ही यह रचना मेरे हृदय से गूंजती है। मैं विनम्रतापूर्वक इसे पाठकों के समक्ष समर्पित करता हूँ, ताकि यह विश्व के स्वर को उनके हृदय में गूंजायमान करे।   


श्लोक 1संस्कृत:

मौनं तवैव संनादति सृष्टेः स्वरमुदाहरति,

नभः प्रभया विश्वं सनातनं संनादति सदा।

मायया सृष्टिकंपनः पृथ्वी शोभति सर्वथा,

ब्रह्म त्वमेव नादरूपं विश्वं स्वरेन संनादति॥


हिंदी अनुवाद: हे नाद, तेरा मौन सृष्टि का प्रथम स्वर रचता है, आकाश की प्रभा से सनातन विश्व सदा गूंजायमान है। माया के सूक्ष्म कंपन से पृथ्वी सर्वथा शोभायमान है। तू ही ब्रह्म है, नादरूप, जो विश्व को स्वर की लय में गूंजायमान करता है।


श्लोक 2संस्कृत:


अग्निः तव स्वरे प्रदीपति तत्वं शोभति पंचधा,

आपः संनादति त्वया विश्वस्य मूलं स्वरात्मकम्।

वायुस्तवैव गीतं च समीरं स्वरति सर्वदा,

नादः त्वमेव प्रकृतौ पंचमहां स्वरनादकः॥


हिंदी अनुवाद: अग्नि तेरे स्वर से प्रज्वलित है, पंचतत्व शोभा पाते हैं। जल तुझसे गूंजता है, तू विश्व का स्वरात्मक मूल है। वायु तेरा गीत है, जो समीर में सदा स्वरित है। हे नाद, तू प्रकृति में पंचतत्वों का परम स्वरनादक है।


श्लोक 3संस्कृत:


शून्यात् त्वमेव संजातः सर्वं स्वरेन संनादति,

मायया विश्वकंपनः सृष्टिः सनातनं स्वरति यत्।

अरूपं रूपं च रचति त्वं ब्रह्मरूपं समाश्रितम्,

नादः त्वमेव प्रकृतौ पुरुषे स्वरनादकः परम्॥


हिंदी अनुवाद: तू शून्य से प्रकट हुआ, सर्वस्व को स्वर से गूंजायमान करता है। माया के कंपन से सृष्टि सनातन स्वर में गूंजती है। अरूप होकर रूप रचता है, तू ब्रह्मरूप है। हे नाद, तू प्रकृति और पुरुष का परम स्वरनादक है।


श्लोक 4संस्कृत:


मंत्रं तवैव मौनं च जीवनं स्वरति त्वया,

काव्यं विश्वमेतत् मायया स्वरेन संनादति।

ब्रह्म त्वमेव काव्यस्य मूलं स्वरात्मकं परम्,

नादः त्वमेव विश्वेन काव्यं सर्वं नादति यत्॥


हिंदी अनुवाद: तेरा मौन मंत्रों में गूंजता है, जीवन तुझसे स्वरित है। माया से यह विश्व काव्य की लय में गूंजता है। तू ही ब्रह्म है, काव्य का स्वरात्मक परम मूल। हे नाद, तू विश्व में काव्य बनकर सर्वस्व को गूंजायमान करता है।


श्लोक 5संस्कृत:


स्वप्नं जाग्रति मायया कालं स्वरेन संनादति,

विश्वं तवैव संनादति सृष्टिकंपनः सर्वदा।

ब्रह्म त्वमेव नादरूपं विश्वस्य जनकः परम्,

नादः त्वमेव सर्वं विश्वेन स्वरेन संनादति॥


हिंदी अनुवाद: स्वप्न और जागरण माया से तुझ में स्वर गूंजता है, काल तेरा नाद है। विश्व तुझसे सृष्टि के कंपन से सदा गूंजता है। तू ही ब्रह्म है, नादरूप, विश्व का परम जनक। हे नाद, तू सर्वस्व को स्वर से गूंजायमान करता है।


श्लोक 6संस्कृत:


शब्दः स एकः त्वमेव गीतं विश्वे स्वरति सदा,

सूत्रं संनादति न च विश्वे छिद्यति कदा।

जीवन्मृतं च रंगति त्वं रंगहीनं स्वरति यत्,

नादः त्वमेव मायया ब्रह्मस्य स्वरनादकः॥


हिंदी अनुवाद: तू एक शब्द है, जो विश्व के गीतों में सदा स्वरित है। तेरा सूत्र गूंजता है, जो विश्व में कभी नहीं टूटता। जीवन और मृत्यु रंगहीन में रंगों से गूंजते हैं। हे नाद, तू माया से ब्रह्म का स्वरनादक है।


श्लोक 7 संस्कृत:


अनंतं तव स्वरं सर्वं विश्वेन संनादति सदा,

पंचमहां तव नादेन विश्वं शोभति सर्वदा।

ब्रह्म त्वमेव नादरूपं स्वयं स्वरति स्वरम्,

नादः त्वमेव प्रकृतौ विश्वस्य कारणं परम्॥


हिंदी अनुवाद: तेरा अनंत स्वर विश्व में सदा गूंजता है। पंचतत्व तेरे नाद से विश्व को सर्वदा शोभायमान करते हैं। तू ही ब्रह्म है, नादरूप, जो स्वयं स्वर से गूंजता है। हे नाद, तू प्रकृति में विश्व का परम कारण है।


श्लोक 8 संस्कृत:


अखंडं तव प्रभया मौनं ब्रह्मरूपं सनातनम्,

अदृश्यं दृश्यं च त्वं स्वरेन संनादति नादकः।

मायया विश्वमेतत् त्वं विश्वेन संनादति सदा,

नादः त्वमेव सर्वं विश्वस्य जनकः परम्॥


हिंदी अनुवाद: तेरा अखंड प्रकाश और मौन सनातन ब्रह्मरूप है। अदृश्य और दृश्य तुझसे स्वर में गूंजता है, तू परम नादक है। माया से यह विश्व तुझसे सदा गूंजायमान है। हे नाद, तू सर्वस्व और विश्व का परम जनक है।


श्लोक 9 संस्कृत:


सृष्टिः तव स्वरे संजाता विश्वं संनादति सदा,

संहारः त्वय्येव सर्वं स्वरेन याति विलीनताम्।

मायया कंपति सर्वं त्वं ब्रह्मस्य कारणं यत्,

नादः त्वमेव सृष्ट्यंतं विश्वस्य स्वरनादकः॥


हिंदी अनुवाद: सृष्टि तेरे स्वर से उत्पन्न हुई, विश्व सदा गूंजता है। संहार तुझमें स्वर से विलीन होता है। माया से सब कुछ कंपित है, तू ब्रह्म का कारण है। हे नाद, तू सृष्टि और अंत का स्वरनादक है।


श्लोक 10 संस्कृत:


चित्तं निरुध्यति त्वं योगेन स्वरेन संनादति,

समाधौ सर्वं त्वमेव च ब्रह्म चिद्रूपकं परम्।

मायया चित्तवृत्तिः स्वरति विश्वं सदा स्वरम्,

नादः त्वमेव योगस्य मार्गं प्रकाशति सदा॥


हिंदी अनुवाद: तू योग से चित्त को शांत करता है, स्वर से गूंजता है। समाधि में सब कुछ तुझसे है, तू चेतना का परम ब्रह्म है। माया से चित्त की तरंगें विश्व को सदा स्वरित करती हैं। हे नाद, तू योग के मार्ग को सदा प्रकाशित करता है।


विश्लेषण: नाद को नादयोग और न्यूरोसाइंस से जोड़ा गया। यह योगसूत्र से प्रेरित है।


श्लोक 11संस्कृत:


ब्रह्मांडं त्वं संनादति अनंतं स्वरेन सर्वदा,

नक्षत्रं तव प्रभया विश्वं संनादति स्वरम्।

मायया सर्वमेतत् त्वं ब्रह्मरूपं समाश्रितम्,

नादः त्वमेव विश्वस्य सृष्टेः स्वरनादकः परम्॥


हिंदी अनुवाद: तू ब्रह्मांड को अनंत स्वर से सदा गूंजायमान करता है। नक्षत्र तेरी प्रभा से विश्व को स्वर में गूंजायमान करते हैं। माया से यह सब ब्रह्मरूप है। हे नाद, तू विश्व की सृष्टि का परम स्वरनादक है।


श्लोक 12संस्कृत:


सत्त्वं रजस्तमस्त्वं त्रिगुणेन स्वरति सदा,

मायया विश्वमेतत् प्रकृत्या संनादति सर्वदा।

ब्रह्म त्वमेव नादरूपं त्रिगुणातीतं यत् स्वरति,

नादः त्वमेव विश्वस्य सृष्टेः कारणं परम्॥


हिंदी अनुवाद: सत्त्व, रज, और तम तुझसे स्वर में सदा गूंजते हैं। माया से यह विश्व प्रकृति द्वारा सर्वदा गूंजायमान है। तू ही ब्रह्म है, नादरूप, जो त्रिगुणों से परे स्वरित है। हे नाद, तू विश्व की सृष्टि का परम कारण है।


श्लोक 13संस्कृत:


प्रणवस्त्वमेव नादः विश्वस्य मूलं सनातनम्,

ॐकाररूपं सर्वं त्वया स्वरेन संनादति।

ब्रह्म त्वमेव नादस्य रूपं समाश्रितं परम्,

नादः त्वमेव सर्वस्य स्वरस्य कारणं यत्॥


हिंदी अनुवाद: तू ही प्रणव (ॐ) है, नाद, विश्व का सनातन मूल। ॐ के रूप में सब कुछ तुझसे स्वर में गूंजता है। तू ही ब्रह्म है, नाद का परम रूप। हे नाद, तू सर्वस्व के स्वर का कारण है।


श्लोक 14संस्कृत:


नासत् सत् नो सत् सर्वं त्वं स्वरेन संनादति,

नादेन विश्वमेतत् सृष्टेः प्रभवति स्वरम्।

मायया कंपति सर्वं त्वं ब्रह्मस्य कारणं सदा,

नादः त्वमेव सृष्टिसूक्तं विश्वस्य मूलनादकः॥


हिंदी अनुवाद: न सत् था, न असत्, तू सर्वस्व को स्वर से गूंजायमान करता है। नाद से यह विश्व सृष्टि का स्वर उत्पन्न करता है। माया से सब कुछ कंपित है, तू ब्रह्म का सदा कारण है। हे नाद, तू सृष्टि-सूक्त और विश्व का मूल नादक है।


श्लोक 15संस्कृत:


हिरण्यगर्भः त्वमेव विश्वं स्वरेन संनादति,

सृष्टिः सर्वं तव मायया प्रभवति नादकः।

ब्रह्म त्वमेव सर्वं स्वयं स्वरेन संनादति,

नादः त्वमेव विश्वस्य सृष्टेः कारणं परम्॥


हिंदी अनुवाद: तू ही हिरण्यगर्भ है, विश्व तुझसे स्वर में गूंजता है। सृष्टि माया से तेरा नाद उत्पन्न करती है। तू ही ब्रह्म है, जो स्वयं स्वर से गूंजता है। हे नाद, तू विश्व की सृष्टि का परम कारण है।

श्लोक 16 संस्कृत:

वेदस्य नादस्त्वमेव विश्वं स्वरेन संनादति,

ऋग्यजुःसामाथर्वं सृष्टेः मूलं स्वरात्मकम्।

मायया सर्वं स्वरति त्वं ब्रह्मस्य नादकः सदा,

नादः त्वमेव विश्वस्य जनकः सनातनं परम्॥


हिंदी अनुवाद: तू वेदों का नाद है, विश्व तुझसे स्वर में गूंजता है। ऋग्, यजुर्, साम, अथर्व—तू सृष्टि का स्वरात्मक मूल है। माया से सब कुछ स्वरित है, तू ब्रह्म का सदा नादक है। हे नाद, तू विश्व का सनातन और परम जनक है।


श्लोक 17संस्कृत:


पुरुषस्त्वमेव विश्वं सर्वं स्वरेन संनादति,

सहस्रशीर्षः मायया सृष्टिः जनति नादकः।

ब्रह्म त्वमेव नादरूपं स्वयं स्वरति स्वरम्,

नादः त्वमेव विश्वस्य मूलं सनातनं परम्॥


हिंदी अनुवाद: तू ही पुरुष है, विश्व तुझसे स्वर में गूंजता है। सहस्र सिरों वाला तू माया से सृष्टि को जन्म देता है। तू ही ब्रह्म है, नादरूप, जो स्वयं स्वर से गूंजता है। हे नाद, तू विश्व का सनातन और परम मूल है।


श्लोक 18संस्कृत:


विश्वं तव रूपं कालः सर्वं स्वरेन संनादति,

मायया विश्वमेतत् त्वं विश्वरूपस्य नादकः।

ब्रह्म त्वमेव नादरूपं स्वयं स्वरति स्वरम्,

नादः त्वमेव सृष्टेः कारणं परमं सदा॥


हिंदी अनुवाद: विश्व तेरा रूप है, काल तुझसे स्वर में गूंजता है। माया से यह विश्व तुझसे गूंजता है, तू विश्वरूप का नादक है। तू ही ब्रह्म है, नादरूप, जो स्वयं स्वर से गूंजता है। हे नाद, तू सृष्टि का परम कारण है।


श्लोक 19संस्कृत:


यज्ञस्त्वमेव नादः विश्वं हविर्भिः स्वरति यत्,

वेदमंत्रैः सर्वं सृष्टेः स्वरं प्रभवति सदा।

ब्रह्म त्वमेव यज्ञरूपं समाश्रितं परमं यत्,

नादः त्वमेव विश्वस्य यज्ञः सनातनं परम्॥


हिंदी अनुवाद: तू ही यज्ञ है, नाद, विश्व हवि से स्वर में गूंजता है। वेदों के मंत्रों से तू सृष्टि का स्वर सदा उत्पन्न करता है। तू ही ब्रह्म है, यज्ञ का परम रूप। हे नाद, तू विश्व का सनातन और परम यज्ञ है।


श्लोक 20 संस्कृत:


नादस्त्वमेव सर्वं विश्वं स्वरेन संनादति,

पूर्णमदः पूर्णमिदं सृष्टेः मूलं सनातनम्।

ब्रह्म त्वमेव नादरूपं स्वयं स्वरति स्वरम्,

नादः त्वमेव विश्वस्य कारणं परमं सदा॥


हिंदी अनुवाद: तू ही नाद है, सर्वस्व, विश्व तुझसे स्वर में सदा गूंजता है। यह पूर्ण है, वह पूर्ण है, तू सृष्टि का सनातन मूल है। तू ही ब्रह्म है, नादरूप, जो स्वयं स्वर से गूंजता है। हे नाद, तू विश्व का परम और सदा कारण है।


लेखक  

विक्रम सिंह 

केशवाही

न तू रूठे न रब रूठे,

 न तू रूठे न रब रूठे,यह मुमकिन हो नहीं सकता।

तेरे चाहत में क़ाफ़िर सा,जिसे देखो वही कहता।।


दुआएं भी फ़िज़ाओं के ,असर का रंग रखती  हैं।

मेरे जो लफ्ज़ उससे हैं,तेरे सजदे में जा झुकता।।


ज़हर  भी  पी  लिया  मैंने , तेरी  तासीर  ऐसी  थी ।

मै खुद को ढूंढने की भी,कवायद अब नहीं करता।।


रवायत बंदिशों  की  है, ख़यानत  करता हूँ उनकी ।

नजर बरहम जमाने की, सुकूँ से फिर भी हूँ रहता ।।


नजऱ क़ातिल  ज़िगर  घायल , हैं  पैहम रोज  के  किस्से ।

जरूरत आब-ओ-दाना की,किताब - ए - इश्क़ न भरता ।।


विक्रम

राधा कृष्ण संवाद

 हमारी पृथ्वी की तुलना  सम्पूर्ण ब्रम्हांड में मौजूद अन्य ग्रहों से की जाय तो अति नगण्य साबित होगी। इसकी विशेषता मात्र इतनी है कि यहाँ जीवन है। इसमें मानवरूपी हमारी प्रजाति फलफूल रही है । यहाँ मौजूद अन्य जीवों से हम स्वंय को ज्यादा बुद्धिमान समझते हैं । विज्ञान के माध्यम से हम प्राकृतिक जटिलताओं को समझने में सक्षम हो रहें हैं ।  आध्यात्म के माध्यम से ईश्वर के रूप में  संपूर्ण सृष्टि के निर्माता की कल्पना कर उसे मूर्तरूप प्रदान कर दिया है । अनेक संप्रदायों व धर्मग्रंथों के माध्यम से उसे अलग अलग नामों से  विभूषित कर , अनेक पूजा पद्धतियों को प्रचलन में ला दिया है । उससे बड़ी बात यह कि हम अपनी अपनी मान्यताओं को सर्वश्रेष्ठ बताकर सदियों से धार्मिक उन्मादों के माध्यम से एक दूसरे का खून  बहाते आ रहें हैं ।


 क्या सच में ईश्वर है ? वह निराकार है या साकार ! ईश्वर अगर एक है तो मानव समाज में विभिन्न धर्म पद्धतियों का प्रचलन क्यों, अन्य जीवों को इसका  ज्ञान क्यो नही ,ऐसे अनेक प्रश्न मन में आते जाते रहते हैं । पर हम जिस धर्म व सामाजिक पद्धति से बंधे होते हैं उसपर हमारी अटूट श्रद्धा बनी रहती है । 

कुछ वर्ष पहले जगन्नाथ मंदिर पूरी में पूजन अर्चन का सौभाग्य प्राप्त हुआ । ज्ञात हुआ कि यहाँ भगवान श्रीकृष्ण का ह्रदय रखा हुआ है वह भी जीवित अवस्था में । मन से प्रश्न आया कि रामकथा तो पूर्ण है, पर जब कृष्ण का ह्रदय धरा पर मौजूद है तो भागवत कथा कैसे पूर्ण हुई । गूगल से लेकर धार्मिक गर्न्थो कथावाचकों से सच्चाई जानने का प्रयास किया । सबकी अलग अलग मान्यताओं व कथाओं से" मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना" वाली स्थिति उत्पन्न हो गई । सच्चाई जानने की उत्कंठा बढ़ती ही जा रही थी । अज्ञानी से ज्ञानी बनने की ऐसी सनक सवार हुई कि मैने उस जीवित ह्रदय के सम्बंध में प्रचलित विभिन्न मान्यताओं की कड़ियों को जोड़कर एक कथानक की सृष्टि कर डाली ।


"महाभारत युद्ध के समाप्ति के बाद कृष्ण के मन में राधा से मिलने की उत्कंठा उत्पन्न हुई । ब्रम्हमुहूर्त काल में द्वारिकापुरी के समुद्र तट पर सूर्योदय पूर्व की लालिमा के नयनाभिराम दृश्य का कृष्ण अवलोकन कर रहे थे तभी राधा प्रगट हुई । दोनों ने एक दूसरे को देखा । राधा पूर्ण यौवनावस्था में दृष्टिगत हो रही थी। ठीक वैसी ही जैसे निधिवन में अपनी अष्टसाखियों के साथ कृष्ण से मिलती थी । राधा के साथ उनकी तीन सखियां ललिता विशाखा चित्रा भी थी । दधीच  की अंतिम अस्थि से बनी बाँसुरी जो बाल्यावस्था में शिव ने कृष्ण को दी थी वह राधा के हाथ में थी । राधा ने अति प्रेमभाव से वह बाँसुरी कृष्ण के हाथ में देकर कृष्ण की ओर देखा । कृष्ण राधा की मनोभावना को समझ असमंजस की स्थिति में आ गए, उन्होंने आश्चर्यचकित नजरों से राधा को देखा । राधा मुस्कुराती रही । अचानक कृष्ण की मुखमुद्रा में चिंता के भाव उत्पन्न हो गए । महाभारत युद्ध के दृश्य एक एक करके उनकी नजरों के सामने आते गए । अर्जुन को गीता के माध्यम से "कर्मण्येवाधिकारस्ते".. का उपदेश देने वाले कृष्ण समझ गए कि महाभारत युद्ध में उनकी भूमिका को लेकर राधा के मन में कई प्रश्न है । अन्यथा उनकी लीला के अंतिम प्रहर में प्रारंभ के प्रसंग की पुनरावृत्ति की यह कैसी इच्छा। राधा ने पुनः कृष्ण को देखा । कृष्ण के चेहरे में खेद के भाव थे । अचानक राधा ने कृष्ण के हाथ से बाँसुरी को छीन कर तोड़ दिया । कृष्ण की स्थिति उस समय किंकर्तव्यविमूढ़ वाली थी। राधा जैसे ही जाने को हुई उनकी तीनों सखियां विनय भाव से उनके सामने आ गई । राधा रुकी ,उनसे कुछ कहा और अंतर्ध्यान हो गई । तीनों सखियां कृष्ण की ओर मुड़ी और विनय भाव से देखा । आहत कृष्ण ने उनसे कुछ कहा और वह वहाँ से चली गई। अर्जुन को अपने विराट स्वरूप का दर्शन कराने वाले कृष्ण समझ गए कि युद्ध में उनकी भूमिका व शक्तियों के प्रयोग से राधा संतुष्ट नही हैं । कर्म योगी को अपने अनुचित कर्मों का दंड मानवरूप में पुनः जन्म लेकर भोगना ही पड़ेगा। तभी राधा कृष्ण के साथ अपने मानवीय  स्वरूप को त्याग सत्यस्वरूप में प्रवेश करेंगी । क्षण मात्र में आगे क्या होगा उसकी पटकथा कृष्ण ने सुनिश्चित कर दी । कुछ समय पश्चात बहेलिए के बाण से घायल होकर कृष्ण ने अपने शरीर का त्याग कर दिया । पर ह्रदय को अग्नि जला नही सकी । वह शरीर के अन्य अंगों की तरह पंचतत्वों में  विलीन नही हुआ। "

अतः जिस दिन श्री जगन्नाथ मंदिर में मौजूद  दिव्य ह्रदय में व्याप्त शक्तियों की अनुभूति सामान्य मानव को  होना बंद हो जाये , हमें समझ जाना चाहिए कि कृष्ण सामान्य मानव के रूप में जन्म लेकर अपने कर्मो का प्रायश्चित कर, राधा के संग गोलोक चले गए हैं । 


विज्ञान हो या अध्यात्म कही गई बातें तर्क संगत होनी चाहिए ।अन्यथा ऐसी कथाओं और प्रसंगों का कोई औचित्य नही ।

इससे लोगों में अंधविश्वास को बढ़ावा मिलता है । मानव रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन ही ईश्वर की सच्ची आराधना है ।


विक्रम

रिश्तों की नीलामी

 रिश्तों की नीलामी में सब , बढ़कर बोली बोल रहे हैं।

दुनियादारी की महफिल में ,अपने पत्ते खोल रहे हैं ।।


  रंग बदलते  चेहरों की , पहचान  अजूबे वाली  है।

 अपनेपन की धार कटीली,अपनेपन में झेल रहे हैं ।।


 एकदूजे के सच से  वाक़िफ़, पर कुछ  पर्दा-दारी है।

 इसीलिए सब रंग में अपने,सबके रंग को घोल रहे हैं।।


बंद जुबाँ का खेल निराला,बिन साक़ी वाली मधुशाला।

जज़्बातों के  जाम थाम कर ,एकदूजे  को  तोल रहें हैं ।।


सच्चे  झूठे  अफ़सानो  से ,  खबरों  के  बाज़ार  गरम  है ।

खुद को आदिल मान के बैठे, मन के क़ातिल डोल रहें हैं।।


विक्रम

श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद

 अर्जुन उवाचः


कामेन संमोहितं चेतो भ्रांत्या सत्यं कथं त्यजेत्।

मिथ्या मनसि संनादति तस्मात् कथं विमुच्यते ।।


अर्थ: अर्जुन पूछते हैं कि जब मन कामनाओं और भ्रांतियों से मोहित हो जाता है, तब सत्य को कैसे पहचाना जाए? और जब मिथ्या (असत्य) मन में गूंजता रहता है, तब उससे मुक्ति कैसे प्राप्त की जाए?


श्रीकृष्ण उवाचः


काममोहविनाशाय सत्यं धृत्वा समाचर। 

विवेकेन मनो नादति मिथ्या तस्मात् परित्रायति।।


अर्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं कि काम और मोह का नाश करने के लिए सत्य को दृढ़ता से पकड़ो और उसी के अनुसार आचरण करो। विवेक (बुद्धि और समझ) से मन को शांत करो, जिससे मिथ्या का शोर खत्म हो और मुक्ति प्राप्त हो।


अर्जुन उवाचः


अज्ञानतमसावृतो नरः कर्महीनः कथं चरेत्।

मूल्यं जीवनविस्मृत्या नाशात् कथं परित्रायति।।


अर्थ: अर्जुन पूछते हैं कि अज्ञान के अंधकार में डूबा व्यक्ति, जो कर्म से विमुख है, जीवन कैसे जिए? जीवन के मूल्यों को भूलकर विनाश से कैसे बचे?


श्रीकृष्ण उवाचः


अज्ञानं तमसो मूलं कर्मयोगेन संनश्यति।

मूल्यं स्मृत्वा मनो नादति नाशात् त्रायति पाण्डव।।


अर्थ: श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि अज्ञान अंधकार का मूल है, और इसे कर्मयोग (निष्काम कर्म) से नष्ट किया जा सकता है। जीवन के मूल्यों को स्मरण करके मन शांत होता है, और यह विनाश से रक्षा करता है।


अर्जुन उवाचः


सत्यं करुणा क्व चास्ति भयं मे हन्ति संनादति।

आत्मज्ञानं कथं लभ्यं मोक्षमार्गः कथं चरेत्।।


अर्थ: अर्जुन पूछते हैं कि सत्य और करुणा कहां पाए जाते हैं?


मेरा भय मुझे सताता और परेशान करता है। आत्मज्ञान कैसे प्राप्त हो, और मोक्ष का मार्ग क्या है?


श्रीकृष्ण उवाचः


सत्यं करुणा यत्रास्ति तत्र मे सन्निधिः सदा।

 आत्मज्ञानेन संनादति मोक्षमार्गः प्रसीदति ।।


अर्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं कि जहां सत्य और करुणा हैं, वहां मैं (ईश्वर) सदा विद्यमान हूं। आत्मज्ञान से मन शांत होता है, और मोक्ष का मार्ग स्पष्ट हो जाता है।


अर्जुन उवाचः


वायौ सूर्ये जले त्वं च कथं नादसि सर्वदा।

विश्वं त्वयि कथं नृत्यति मार्ग कथय मे प्रभो।।


अर्थ: अर्जुन पूछते हैं कि आप (ईश्वर) वायु, सूर्य, और जल में कैसे सदा गूंजते हैं? विश्व आपमें कैसे नृत्य करता है? मुझे मार्ग बताएं।


श्रीकृष्ण उवाचः


वायौ सूर्ये जले सर्वं मयि नादति नित्यदा।

विश्वं मय्येव नादति ति मार्गं याति हि पाण्डव।।


अर्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं कि वायु, सूर्य, जल, और सर्वत्र मैं ही नित्य गूंजता हूं। विश्व मुझमें ही नाद करता है, और यही मोक्ष का मार्ग है।


अर्जुन उवाचः

कथं तव संपूर्ण रूपं विज्ञातुं हि समर्हति।

विश्वं त्वयि कथं संनृत्यति सर्वं कथय प्रभो।।


अर्थ: अर्जुन पूछते हैं कि आपके संपूर्ण रूप को कैसे जाना जा सकता है? विश्व आपमें कैसे नृत्य करता है? मुझे सब बताएं।


श्रीकृष्ण उवाचः


आत्मज्ञानेन मे रूपं संपूर्ण सम्प्रकाशति।

विश्वं मय्येव संनृत्यति सर्वं मयि संनादति।।


अर्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मज्ञान के द्वारा मेरा संपूर्ण रूप प्रकट होता है। विश्व मुझमें ही नृत्य करता है, और सब कुछ मुझमें ही गूंजता है।


अर्जुन उवाचः


हे कृष्ण चित्तविक्लेशे शान्तिः कथं भवेत् प्रभो ।

 करुणया बोधय स्वामिन् संशयं मे समाहर ॥


श्री कृष्ण उवाचः


यदा विश्वं समदृष्ट्या आत्मवत् त्वं विलोकसि । 

तदा संशयाः विलीयन्ति चित्तं शान्तिम् समाश्रति ॥


अर्थः


अर्जुन उवाचः


हे कृष्ण ! चित्त के विक्लेश में शांति कैसे प्राप्त हो, हे प्रभु? अपनी करुणा से मुझे समझाइए और मेरे संशय को पूरी तरह दूर कीजिए।


श्री कृष्ण उवाचः


जब तुम विश्व को समान दृष्टि से और आत्मा के समान देखते हो, तब सारे संशय लुप्त हो जाते हैं और चित्त शांति का आश्रय लेता है।


(मन में उत्पन्न भावों से रचित श्लोकों की प्रस्तुति 

, ज्ञानी जनों से त्रुटियों पर सुझाव की अपेक्षा है)

पितामह भीष्म एवं श्रीकृष्ण संवाद

 कुरुक्षेत्र युद्धोत्तर श्रीकृष्ण-भीष्म संवादकालखंड की पृष्ठभूमि:

......................….…................................................


द्वापर युग के अंत में, कुरुक्षेत्र की रणभूमि रक्तरंजित हो चुकी थी। महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ,कौरवों का सर्वनाश हुआ और पांडव विजयी हुए, किंतु विजय का यह क्षण भीष्म पितामह के लिए मृत्युशय्या पर शरों के बिछौने का प्रतीक बन गया। गंगा-पुत्र भीष्म, कुरुवंश के सर्वोच्च कुलप्रमुख,अपने अंतिम क्षणों में जीवन, धर्म, और विश्व के गहन रहस्यों पर चिंतन कर रहे थे। इस पृष्ठभूमि में, श्रीकृष्ण, जो युद्ध में पांडवों के सारथी और मार्गदर्शक थे, भीष्म के समक्ष उपस्थित हुए। भीष्म पितामह ,कृष्ण का यह संवाद न केवल एक दार्शनिक विमर्श है, अपितु द्वापर युग में नैतिक परम्पराओं के पतन से उपजे प्रश्न और विश्व की संरचना के रहस्यों को उजागर करता है।


:   पितामह भीष्म एवं श्रीकृष्ण संवाद। 

:

श्रीकृष्ण: प्रणाम, गंगापुत्र पितामह। शरशय्या पर विराजमान आपको देख मेरा हृदय करुणा से कम्पित हो उठता है। कुशल-क्षेम पूछने का साहस नहीं जुटा पाता, किन्तु आपके सान्निध्य में मेरा चित्त जागृत हो उठता है।


भीष्म: (मुस्कुराते हुए) आइए, देवकीनंदन। आपके दर्शन से मेरे मन में शांति की लहर उठती है। मृत्यु के समीप होने पर भी मेरे हृदय में कुछ संशय गूंज रहे हैं। क्या उन्हें आपके समक्ष प्रकट करना उचित होगा?


श्रीकृष्ण: निश्चय ही, पितामह। आपके प्रश्न मेरे लिए सदा स्वागत योग्य हैं।


भीष्म: माधव, क्या आप ही इस विश्व के मूल और सर्वस्व हैं?


श्रीकृष्ण: (हल्के हास्य के साथ) नहीं, पितामह। मैं तो केवल अर्जुन का सखा और कुरुवंश का पौत्र हूं।


भीष्म: (सौम्य मुस्कान के साथ) छोड़िए, कन्हैया, यह माया। प्रस्थान से पूर्व एक संशय प्रकट करता हूं—कुरुक्षेत्र में हुआ यह संग्राम क्या धर्म के अनुरूप था?


श्रीकृष्ण: पितामह, आप किस दृष्टिकोण से विचार करते हैं?


भीष्म: पांडवों के पक्ष से।


श्रीकृष्ण: उसका उत्तर मैं कैसे दूं, गंगापुत्र? यह प्रश्न तो पांडवों से ही पूछा जाना चाहिए।


भीष्म: (आश्चर्य से) केशव, आप ऐसा कहते हैं? आपके सान्निध्य में युद्ध की सारी मर्यादाएं भंग हो गईं। कौरवों के अधर्म की चर्चा नहीं करता, परंतु पांडवों से आपके साथ होने से धर्म की रक्षा की अपेक्षा थी। श्रीराम ने कभी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं किया।


श्रीकृष्ण: (गंभीर स्वर में) पितामह, अहंकारी रावण, जो शिव का उपासक था। उसने सीता का हरण किया, फिर भी उनकी मर्यादा की रक्षा की, तब क्या आपके जैसे महानुभावों की उपस्थिति में द्रौपदी और अभिमन्यु के साथ जो हुआ, वह धर्मसंगत था? अब आप द्रोण, जयद्रथ, कर्ण और दुर्योधन की बात करेंगे। जब एक पक्ष धर्म की सीमा लांघता है, तब दूसरा पक्ष भी उसी मार्ग पर चल पड़ता है। राम और कृष्ण का यह भेद काल और परिस्थितियों का परिणाम है।


भीष्म: (नेत्र बंद कर, चिंतन में डूब जाते हैं ) कन्हैया, क्या यह आपकी लीला का विलास है? सब कुछ आपके द्वारा रचित है, फिर भी आप उससे पृथक हैं। अब मेरे अंतिम संशय को सुनें—जीवनचक्र का गूढ़ रहस्य, विश्व की उत्पत्ति का कारण क्या है? आपके साथ संनाद करने के बाद यह बोध की तीव्र इच्छा और प्रबल हो उठी है।


श्रीकृष्ण: पितामह, यह कैसी कामना है? मैं भी कालचक्र के अधीन हूं।


भीष्म: तो फिर कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया गया वह उपदेश क्या था?


श्रीकृष्ण: वह उसके कर्तव्यों का स्मरण मात्र था।


भीष्म: (करुण स्वर में) कृपा करें, यदुपति। शरशय्या पर पड़े मेरे मन में गहन नाद गूंज रहा है। यदि मेरे प्रश्नों का समाधान न मिला, तो मेरे जीवन का सारा ज्ञान और कर्म व्यर्थ हो जाएगा।


श्रीकृष्ण: (मुस्कुराते हुए, सौम्य स्वर में) पितामह, इस भौतिक जगत की संरचना का रहस्य जटिल अवश्य है, परंतु उसे समझा जा सकता है। इसके बोध के लिए मानव को ज्ञान, भक्ति और वैराग्य के समन्वय और संतुलन की आवश्यकता है। सामान्य ज्ञान तो केवल जीवन के कर्मों के निर्वहन के लिए है, किन्तु इस रहस्य को समझने के लिए ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का सामंजस्य अपरिहार्य है। यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड ग्यारह आयामों में विभक्त है। हम इस समय तृतीय आयाम में विचरण कर रहें हैं। दस आयाम बोधगम्य हैं, किन्तु ग्यारहवां आयाम मैं स्वयं हूं। सब कुछ मुझसे प्रादुर्भूत होता है और मुझमें ही समाहित हो जाता है। इस ब्रह्मांड की अवस्था मेरे चेतन और अवचेतन से संनाद करती है। मेरे अवचेतन में ज्ञान का उदय मेरी चेतना को जागृत करता है। या यूँ कहें, अज्ञान के सूक्ष्म अणु में ज्ञान का प्रादुर्भाव ही इस भौतिक संरचना का जनक है।  


भीष्म: (नेत्र बंद किए) कृष्ण के वचनों को सुनते हैं। सहसा वह नेत्र खोलते हैं। चारों ओर घोर अंधकार व्याप्त है, उन्हें स्वयं की भी अनुभूति नहीं हो रही। तभी उस अंधकार में प्रकाश का एक अति सूक्ष्म कण दृष्टिगोचर होता है। वह धीरे-धीरे विशाल तेजःपुंज में परिणत हो जाता है। उससे राधा प्रकट होती हैं, जो शीघ्र ही अर्धनारीश्वर रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। कुछ क्षण बाद वह स्वरूप राधाकृष्ण रूप में विभाजित हो जाता है। अब उनके समक्ष केवल कृष्ण दृश्यमान हैं, और अंधकार यथावत है। सहसा भीष्म देखते हैं कि कृष्ण से उनका स्वयं का रूप प्रगट होता है, और फिर वह उसी में समाहित हो जाता है। अंधकार लुप्त हो जाता है। सामने कृष्ण मुस्कुराते हुए खड़े हैं। भीष्म के नेत्रों से प्रेम और भक्ति से युक्त अश्रुधारा बहने लगती है।


भीष्म: (आवेश और कृतार्थ भाव से) माधव, मैं जीवन के यथार्थ बोध से परिपूर्ण हो गया हूं।


श्रीकृष्ण: प्रणाम, पितामह। अब मेरे प्रस्थान का समय है।


भीष्म: (मुस्कुराते हुए, आशीर्वाद के रूप में हाथ उठाकर) जाइए, कन्हैया।


विक्रम (  कुरूक्षेत्र युद्ध के पश्चात वाणशैय्या में लेटे हुए श्रीकृष्ण व पितामह के बीच हुए संवाद को अपने दृष्टिकोण से एक नए स्वरूप में प्रस्तुत करने का सूक्ष्म प्रयास )

 कुरुक्षेत्रयुद्धोत्तरं संनादः

 कुरुक्षेत्रयुद्धोत्तरं संनादः


 श्रीकृष्ण-भीष्मसंनादकालखण्डस्य पृष्ठभूमिः द्वापरयुगस्यान्ते कुरुक्षेत्रस्य रणभूमिः रुधिरेण संनादति स्म। महाभारतस्य महासंग्रामः समाप्तः, यत्र कौरवाणां सर्वं विनष्टं, पाण्डवाश्च विजयिनः संनादति। किन्तु एषा जयः भीष्मपितामहस्य शरशय्यायां अन्तिमक्षणानां प्रतीकमभवत्। गङ्गापुत्रः भीष्मः, कुरुवंशस्य सर्वोच्चः कुलगुरुः, स्वस्यान्तिमसमये जीवनं, धर्मं, विश्वस्य च गहनरहस्यानि चिन्तति स्म। अस्मिन् सन्दर्भे, श्रीकृष्णः, यः संग्रामे पाण्डवानां सारथिः मार्गदर्शकश्च आसीत्, भीष्मस्य समक्षमुपस्थितः। एषः संनादः न केवलं दार्शनिकं विमर्शं, किन्तु द्वापरयुगस्य नीतिमूल्यानि, कर्तव्यम्, विश्वस्य च संरचनायाः गूढरहस्यानां उद्घाटनं करोति।


श्रीकृष्णः: प्रणामः, गङ्गापुत्र पितामह। शरशय्यायां विद्यमानं त्वां दृष्ट्वा मम हृदयं करुणया कम्पति। कुशलं पृच्छितुं न शक्नोमि, किन्तु तव सान्निध्यं मम चेतः प्रबुध्यति।


भीष्मः: (स्मित्वा) आगच्छ, देवकीनन्दन। तव दर्शनं मम मनसि शान्तिं वहति। मृत्योः समीपे विद्यमानस्य मम हृदये संशयाः प्रनादन्ति। किं तान् त्वां प्रति प्रकटामि?


श्रीकृष्णः: अवश्यं, पितामह। तव प्रश्नाः मम कृते सदा स्वागताः।


भीष्मः: माधव, किं त्वं विश्वस्य मूलं, सर्वस्य संनादति?

श्रीकृष्णः: (हास्येन) नहि, पितामह। अहम् अर्जुनस्य सखा, कुरुवंशस्य पौत्रश्च।


भीष्मः: (सौम्यं स्मित्वा) त्यज, कन्हैया, एतां मायाम्। प्रस्थानात् पूर्वं एकं संशयं प्रकटामि—कुरुक्षेत्रे सम्भूतः एषः संग्रामः किं धर्मसङ्गतः आसीत्?


श्रीकृष्णः: पितामह, कस्य दृष्टिकोणेन विचारसि?


भीष्मः: पाण्डवपक्षेन।


श्रीकृष्णः: तस्य उत्तरं कथं ददामि, गङ्गापुत्र? एतत् तु पाण्डवेभ्यः एव पृच्छ।


भीष्मः: (विस्मयेन) केशव, त्वमेवमिदं वदसि? तव सान्निध्ये युद्धस्य मर्यादाः खण्डिताः। कौरवाणाम् अधर्मं न कथयामि, किन्तु पाण्डवानां त्वया सह धर्मस्य रक्षा अपेक्षिता। श्रीरामः कदापि मर्यादानां लङ्घनं न चकार।


श्रीकृष्णः: (गम्भीरं) पितामह, यदा रावणः, शिवस्य उपासकः, सीतायाः हरणं कृत्वा तथापि तस्याः मर्यादायाः रक्षां चकार, तदा किं त्वदृशानां महानुभावानां सन्निधौ द्रौपद्याः अभिमन्योश्च यद् अभवत्, तत् धर्मसङ्गतं आसीत्? अधुना त्वं द्रोणस्य, जयद्रथस्य, कर्णस्य, दुर्योधनस्य च कथां कथयिष्यसि। यदा एकः पक्षः धर्मस्य सीमां लङ्घति, तदा अन्यपक्षेनापि तादृशी परम्परा वहति। राम-कृष्णयोः भेदः कालस्य परिस्थितीनां च प्रभावति।


भीष्मः: (निमीलितनयनः, चिन्तनमग्नः) कन्हैया, किमिदं तव लीलाविलासः? सर्वं त्वया रचितं, तथापि त्वं ततः पृथक्। अधुना मम अन्तिमं संशयं शृणु—जीवनचक्रस्य गूढं रहस्यं, विश्वस्य उत्पत्तेः कारणं किम्? त्वया सह संनादति पश्चात् एषा बोधेच्छा प्रबलतरा अभवत्।


श्रीकृष्णः: पितामह, किमियं कामना? अहमपि कालचक्रस्य अधीनः।


भीष्मः: तर्हि कुरुक्षेत्रे अर्जुनाय दत्तं तत् उपदेशं किम्?


श्रीकृष्णः: तत् तु तस्य कर्तव्यानां स्मारणाय।


भीष्मः: (करुणस्वरेण) कृपां कुरु, यदुपते। शरशय्यायां विद्यमानस्य मम मनसि गहनं नादति। यदि मम प्रश्नानां समाधानं न लभति, तर्हि मम जीवनस्य सर्वं ज्ञानं कर्म च व्यर्थं भवति।


श्रीकृष्णः: (स्मित्वा, सौम्यं) पितामह, विश्वस्य एषा भौतिकसंरचना रहस्यमयी खलु, किन्तु बोधगम्या। तस्य बोधाय मानवस्य ज्ञानं, भक्तिः, वैराग्यं च समन्वयेन संनादति। सामान्यं ज्ञानं केवलं जीवनकर्मणः निर्वहणाय, किन्तु एषः रहस्यबोधः ज्ञान-भक्ति-वैराग्यस्य संनादति संतुलनेनैव सम्भवति। विश्वः एकादश आयामेषु विभक्तः। वयं तृतीयायामे वहामः। दश आयामाः बोधगम्याः, किन्तु एकादशः आयामः अहम् एव। सर्वं मत्तः प्रभवति, मयि च लीयति। विश्वस्य एषा अवस्था मम चेतन-अवचेतनाभ्यां वहति। मम अवचेतने ज्ञानस्य प्रादुर्भावः मम चेतनां प्रबुध्यति। यथा अज्ञानस्य सूक्ष्मकणात् ज्ञानस्य उदयः एव विश्वस्य भौतिकसंरचनायाः कारकं भवति।  


भीष्मः: (निमीलितनयनः) कृष्णस्य वचनानि शृणोति। सहसा सः नयनं उन्मीलति। सर्वं तमसा संनादति, स्वस्य संनादति न संनादति। तदा तस्मिन् घोरतमसि प्रकाशस्य सूक्ष्मं कणं दृष्टिगोचरं भवति। तत् क्रमशः विशालं तेजःपुंजं परिणति। तस्मात् राधा प्रकटति, सा शीघ्रं अर्धनारीश्वररूपेण वहति। कतिपयं क्षणं पश्चात् तत् पुनः राधाकृष्णरूपेण विभजति। अधुना भीष्मस्य पुरतः केवलं कृष्णः दृश्यति, तमः च यथावत्। सहसा भीष्मः दृष्टवान् यत् कृष्णात् तस्य स्वयं रूपं प्रगटति, तत् पुनः तस्मिन् लीयति। तमः संनादति। कृष्णः स्मित्वा संनादति। भीष्मस्य नयनेभ्यः प्रेमभक्तियुक्तं अश्रु वहति।


भीष्मः: (आवेशेन, कृतार्थः) माधव, अहं जीवनस्य यथार्थबोधेन परिपूर्णः।


श्रीकृष्णः: प्रणामः, पितामह। अधुना मम प्रस्थानाय समयः।


भीष्मः: (स्मित्वा, आशीर्वादरूपेण हस्तं वहति) गच्छ, कन्हैया।


  विक्रमः (कुरुक्षेत्रयुद्धस्य पश्चात् शरशय्यायां शयानस्य श्रीकृष्णस्य पितामहस्य च संनादस्य स्वदृष्टिकोणेन नवीनरूपेण संनादति सूक्ष्मप्रयासः)

 नादस्य विश्वनादः

 II. संस्कृत रचना: नादस्य विश्वनादः ।।


श्लोक 

1मौनं किमस्ति नादः स्वरति न कथं विश्वजन्मकृत्,

नीलं नभस्तव प्रभया परिभाषति सर्वं मायामयम्।

पृथ्वी तवैव शोभति च संनादति मायया स्वरम्,

ब्रह्म त्वमेव सर्वं समुच्छ्रति स्वयमाश्रितं यत्॥

हिंदी अनुवाद:

हे नाद, तेरा मौन क्यों, विश्व के जन्म में स्वर क्यों नहीं गूंजता?

नीला आकाश तेरी प्रभा से मायामय सब कुछ परिभाषित करता है।पृथ्वी तेरे कारण सुशोभित है, माया से स्वर गूंजता है,तू ही ब्रह्म है, जो स्वयं सब कुछ समेटता और आश्रित करता है।


श्लोक 2

अग्निस्तवैव दीपति स्म शोभति पंचमहां यथा,

आपस्त्वमेव संनादति विश्वस्य जन्महेतुकम्।

अनिलस्तवैव चंचलति पंचमं तत्समीरजात्,

नादः त्वमेव पंचमहाभृतं प्रकृतौ संनादति॥

हिंदी अनुवाद:

अग्नि तेरे कारण प्रज्वलित है, पंचतत्वों में शोभित है।

जल तुझमें गूंजता है, तू विश्व के जन्म का कारण है।

वायु तेरे कारण चंचल है, पंचतत्वों में उत्पन्न,

हे नाद, तू प्रकृति में पंचतत्वों को गूंजायमान करता है।


श्लोक 3

शून्यात् त्वमेव जायसि दिशां विदिशां च वहसि यत्,

मौनस्य नद्या विश्वमिदं मायया संनादति स्म।

अरूपरूपं त्वं सर्वं समीक्षसि ब्रह्म च रूपकम्,

नादः त्वमेव प्रकृतिपुरुषौ स्वयमाश्रितं स्वरम्॥

हिंदी अनुवाद:

तू शून्य से उत्पन्न होता है, दिशा-विदिशा में बहता है।

मौन की नदी से माया द्वारा यह विश्व गूंजता है।

अरूप होकर रूप रचता है, तू ब्रह्मरूप है,

हे नाद, तू प्रकृति-पुरुष को स्वयं में आश्रित स्वर है।


 श्लोक 4

मौनं तवैव छंदसि च जीवनं स्मृतं त्वया सदा,

मायया विश्वमेतत् जल्पति च संनादति स्वरम्।

ब्रह्म त्वमेव सर्वं समाश्रितं विश्वजन्मनः स्म,

नादः त्वमेव काव्यं सदा सर्वस्य कारणं हि॥

हिंदी अनुवाद:

तेरा मौन छंदों में गूंजता है, जीवन तुझसे स्मृत है।

माया से यह विश्व बोलता और स्वर से गूंजता है।

तू ही ब्रह्म है, जो विश्व के जन्म को समेटता है,

हे नाद, तू ही काव्य और सदा सबका कारण है।


श्लोक 5

वर्तमानं भ्रमच्छायया त्वया स्वप्नं जाग्रति स्म,

कालस्य सर्वं तद्भवति मायया संनादति स्वरम्।

ब्रह्म त्वमेव जनकः सदा विश्वजन्मस्य नाद,

नादः त्वमेव सर्वं समुच्छ्रति मायया स्वयम्॥

हिंदी अनुवाद:

वर्तमान माया की छाया है, स्वप्न और जागरण तुझसे है।

काल के सभी रूप तुझसे हैं, माया से गूंजते हैं।

तू ही ब्रह्म, विश्व का जनक है, हे नाद,

तू माया से सब कुछ स्वयं समेटता है।


शब्दः स एकः बहुधा स्म गीतं समुच्छ्रति स्वरम्,

डोरी सनादति न च छिद्यते विश्वजन्मनि यत्।

जीवन्मृतं च विलयति रंगं रंगहीनके स्म,

नादः त्वमेव मायया स्मृतं ब्रह्मस्वरनादकः॥

हिंदी अनुवाद:

एक शब्द, पर अनेक गीतों में स्वर गूंजता है।

डोर गूंजती है, पर विश्व के जन्म में उसका छोर नहीं।

जीवन और मृत्यु विलय होते हैं, रंगहीन में रंग हैं,

हे नाद, तू माया से स्मृत है, ब्रह्म का स्वरनादक है।


  श्लोक 7

अनंतमाश्रितं त्वं स्म पुनरंतहीनता सदा,

पंचमहाभृतगीतं तव स्वनादेन संनादति।

ब्रह्म त्वमेव सर्वं स्वयं स्वसंनादति स्वरम्,

नादः त्वमेव प्रकृतिपुरुषौ विश्वस्य कारणम्॥


हिंदी अनुवाद:

तू अनंत को समेटता है, फिर भी सदा अंतहीन है।

पंचतत्वों का गीत तेरा नाद गूंजता है।

तू ही ब्रह्म है, जो स्वयं से स्वरनाद करता है,

हे नाद, तू प्रकृति-पुरुष और विश्व का कारण है।

  

श्लोक 8

अखंडमाश्रितं प्रभया तव मौनं च ब्रह्म हि,

अदृश्यदृश्यरूपं त्वं चक्षुषः स्म तिरोहसि।

मायया विश्वमेतत् त्वं स्फुरति स्म स्वरनादकः,

नादः त्वमेव सर्वं विश्वस्य जनकः सदा॥


हिंदी अनुवाद:

तेरा अखंड प्रकाश और मौन ही ब्रह्म है।

अदृश्य में दृश्यरूप होकर तू दृष्टि से ओझल है।

माया से यह विश्व स्फुरित है, तू स्वरनादक है,

हे नाद, तू ही सर्वस्व और विश्व का सदा जनक है।


  श्लोक 9

सृष्टिस्तवैव संजाता संनादति तव स्वरात् स्म,

संहारकालस्त्वय्येव विश्वं याति विलीनताम्।

मायया सर्वं संनादति त्वं ब्रह्मस्य कारणकम्,

नादः त्वमेव सृष्ट्यंतं विश्वस्य स्वरनादकः॥


हिंदी अनुवाद:

सृष्टि तुझसे उत्पन्न हुई, तेरा स्वर गूंजता है।

संहार का काल तुझमें विश्व को विलीन करता है।

माया से सब कुछ गूंजता है, तू ब्रह्म का कारण है,

हे नाद, तू सृष्टि और अंत का स्वरनादक है।


 श्लोक 10

चित्तं निरोधति त्वं स्म योगेन संनादति स्वरम्,

समाधिस्थं त्वया सर्वं ब्रह्म त्वं चिद्रूपकः।

मायया चित्तवृत्तिस्त्वं विश्वं संनादति स्वयम्,

नादः त्वमेव योगस्य मार्गं प्रकाशति सदा॥

हिंदी अनुवाद:

तू योग से चित्त को शांत करता है, तेरा स्वर गूंजता है।

समाधि में सब कुछ तुझसे है, तू चेतना का ब्रह्म है।

माया से चित्त की तरंगें गूंजती हैं,हे नाद, तू योग के मार्ग को सदा प्रकाशित करता है।


 श्लोक 11

ब्रह्मांडमाश्रितं त्वं पुनरनंतता सदा स्म यत्,

नक्षत्रखं तव प्रभया विश्वं संनादति स्वरम्।

मायया सर्वमेतत् त्वं स्फुरति स्म ब्रह्मरूपकः,

नादः त्वमेव सर्वं समुच्छ्रति विश्वजन्मनः॥

हिंदी अनुवाद:

तू ब्रह्मांड को समेटता है, फिर भी सदा अनंत है।

नक्षत्रों का आकाश तेरी प्रभा से विश्व को गूंजायमान करता है।

माया से यह सब स्फुरित है, तू ब्रह्मरूप है,

हे नाद, तू विश्व के जन्म को समेटता है।

 

 श्लोक 12

सत्त्वं रजस्तमस्त्वं त्रिगुणेन संनादति स्वयम्,

मायया विश्वमेतत् त्वं प्रकृत्या संनादति सदा।

ब्रह्म त्वमेव सर्वं स्वयं स्वसंनादति स्वरम्,

नादः त्वमेव त्रिगुणातीतं विश्वस्य कारणम्॥

हिंदी अनुवाद:

सत्त्व, रज, और तम तुझसे गूंजते हैं।

माया से यह विश्व प्रकृति द्वारा गूंजायमान है।

तू ही ब्रह्म है, जो स्वयं से स्वरनाद करता है,

हे नाद, तू त्रिगुण से परे और विश्व का कारण है।


श्लोक 13

प्रणवस्त्वमेव नादः स्म विश्वस्य मूलं सनातनम्,

ॐकाररूपं संनादति सर्वं त्वया स्वरनादकः।

ब्रह्म त्वमेव नादस्य रूपं समाश्रितं सर्वदा यत्,

नादः त्वमेव सर्वस्य संनादः कारणं सदा॥

हिंदी अनुवाद:

तू ही प्रणव (ॐ) है, नाद, विश्व का सनातन मूल।

ॐ के रूप में सब कुछ तुझसे गूंजता है, तू स्वरनादक है।

तू ही ब्रह्म है, नाद का रूप, जो सब कुछ समेटता है,

हे नाद, तू ही सबके गूंजने का सदा कारण है।


श्लोक 14

नासत् सत् नो सत् आसद् विश्वं त्वं संनादति स्वयम्,

नादेन विश्वमेतत् त्वं सृष्टेः प्रभवति स्वरम्।

मायया सर्वं संनादति त्वं हि ब्रह्मस्य कारणकम्,

नादः त्वमेव सृष्टिसूक्तं विश्वस्य मूलनादकः॥

हिंदी अनुवाद:

न सत् था, न असत्, तू ही विश्व को गूंजायमान करता है।

नाद से यह विश्व उत्पन्न होता है, तेरा स्वर सृष्टि है।

माया से सब कुछ गूंजता है, तू ब्रह्म का कारण है,

हे नाद, तू सृष्टि-सूक्त और विश्व का मूल नाद है।


 श्लोक 15

हिरण्यगर्भस्त्वमेव स्म विश्वं संनादति त्वया,

सृष्टेः प्रभवति सर्वं मायया तव स्वरनादकः।

ब्रह्म त्वमेव सर्वं स्वयं स्वसंनादति स्वरम्,

नादः त्वमेव विश्वस्य सृष्टेः कारणं सदा हि॥

हिंदी अनुवाद:

तू ही हिरण्यगर्भ है, विश्व तुझसे गूंजता है।

सृष्टि माया से तेरा स्वरनाद उत्पन्न करता है।

तू ही ब्रह्म है, जो स्वयं से स्वरनाद करता है,

हे नाद, तू विश्व की सृष्टि का सदा कारण है।


  श्लोक 16

वेदस्य नादस्त्वं हि सर्वं विश्वं संनादति स्वरम्,

ऋग्यजुःसामाथर्वं त्वं सृष्टेः मूलं च कारणम्।

मायया सर्वं त्वं स्मृतं ब्रह्मस्य स्वरनादकः,

नादः त्वमेव सर्वं विश्वस्य जनकः सदा॥

हिंदी अनुवाद:

तू वेदों का नाद है, विश्व तेरा स्वर गूंजता है।

ऋग्, यजुर्, साम, अथर्व—तू सृष्टि का मूल और कारण है।

माया से सब कुछ स्मृत है, तू ब्रह्म का स्वरनादक है,

हे नाद, तू ही सर्वस्व और विश्व का सदा जनक है।


श्लोक 17 

पुरुषस्त्वमेव विश्वं स्म सर्वं त्वया संनादति यत्,

सहस्रशीर्षः सर्वं त्वं मायया सृष्टिजन्मकृत्।

ब्रह्म त्वमेव सर्वस्य नादः स्वरनादति स्वयम्,

नादः त्वमेव विश्वस्य मूलं सनातनं परम्॥

हिंदी अनुवाद:

तू ही पुरुष है, विश्व तुझसे गूंजता है।

सहस्र सिरों वाला तू माया से सृष्टि का जन्म करता है।

तू ही ब्रह्म है, जो स्वयं से स्वरनाद करता है,

हे नाद, तू विश्व का सनातन और परम मूल है।


  श्लोक 18 

विश्वं तवैव रूपं स्म कालः सर्वं त्वया गृहीतम्,

मायया संनादति विश्वं त्वं विश्वरूपस्य नादकः।

ब्रह्म त्वमेव सर्वं स्वयं स्वसंनादति स्वरम्,

नादः त्वमेव सर्वस्य सृष्टेः कारणं परम्॥

हिंदी अनुवाद:

विश्व तेरा ही रूप है, काल तुझमें समाहित है।

माया से विश्व गूंजता है, तू विश्वरूप का नादक है।

तू ही ब्रह्म है, जो स्वयं से स्वरनाद करता है,

हे नाद, तू सृष्टि का परम कारण है।


श्लोक 19 (नया: वैदिक यज्ञ)

यज्ञस्त्वमेव नादः स्म विश्वं हविर्भिः संनादति यत्,

वेदस्य मंत्रैः सर्वं त्वं सृष्टेः प्रभवति स्वरम्।

ब्रह्म त्वमेव यज्ञस्य रूपं समाश्रितं सर्वदा यत्,

नादः त्वमेव विश्वस्य यज्ञः सनातनं परम्॥

हिंदी अनुवाद:

तू ही यज्ञ है, नाद, विश्व हवि से गूंजता है।

वेदों के मंत्रों से तू सृष्टि का स्वर उत्पन्न करता है।

तू ही ब्रह्म है, यज्ञ का रूप, जो सब कुछ समेटता है,

हे नाद, तू विश्व का सनातन और परम यज्ञ है।


 श्लोक 20

नादस्त्वमेव सर्वं स्म विश्वं तवैव स्वरनादति,

पूर्णमदः पूर्णमिदं त्वं सृष्टेः मूलं सनातनम्।

ब्रह्म त्वमेव सर्वस्य नादः स्वयं स्वसंनादति,

नादः त्वमेव विश्वस्य कारणं परमं सदा॥

हिंदी अनुवाद:

तू ही नाद है, सर्वस्व, विश्व तेरा स्वर गूंजता है।

यह पूर्ण है, वह पूर्ण है, तू सृष्टि का सनातन मूल है।

तू ही ब्रह्म है, जो स्वयं से स्वरनाद करता है,

हे नाद, तू विश्व का परम और सदा कारण है।


लेखक

विक्रम सिंह 

केशवाही

संनादति विश्वम्: 

 संनादति विश्वम्: 

श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद 

 अध्याय प्रथम: ब्रह्मसृष्टितत्त्वविमर्शः  


श्रीकृष्ण उवाच:

न मे रूपं न च सीमा विश्वविस्तारसंग्रहम्।

न दृश्यं न च बोध्यं च न वर्ण्यं कारणं मम।।

यथा सिन्धौ तरङ्गाणां स्वरूपं न स्थिरं भवेत्।

सर्वं मया समुद्भूतं, सर्वज्ञः स्वयमेवाहम्।।१।।  

हिंदी अनुवाद:

मेरा न कोई रूप है, न मेरे विस्तार की सीमा। जैसे सागर में तरंगों का स्वरूप स्थिर नहीं, वैसे ही मेरा स्वरूप न देखा जा सकता, न समझा, न वर्णित। मैं विश्व का कारण हूँ, सर्व कुछ मुझसे उत्पन्न, और मैं स्वयं सर्वज्ञ हूँ।  


कल्पनाः सर्वथा कुर्या यथाशक्ति यथाबलम्।

ज्ञानेन साधनेनैव प्राप्नुहि तव प्रियं सदा।।

यथा तमसि दीपेन संनादति प्रकाशति।

चेतन्यं मे समुद्भूतं तपोध्यानस्य संनादति।।२।।  हिंदी अनुवाद:

अपनी शक्ति और सामर्थ्य से सभी प्रकार की कल्पनाएँ कर, और ज्ञान व साधनों से वह प्राप्त कर जो तुझे प्रिय है। जैसे अंधेरे में दीपक प्रकाश से संनादता है, वैसे ही गहन अवचेतना से चेतना में प्रवेश तप और ध्यान की परम अवस्था है, जो मेरे साथ तुम्हारे संनाद को दर्शाती है।  


अहं शून्यस्य सृष्टा वै कल्पनाजल्पनात्मकः।

वर्तमानस्य जनकः स्याम् स्वप्नजागृतिभासकः।।

यथा स्वप्ने न सत्यं च न च मिथ्या प्रतीति सा।

मायामयं विश्वं मम कालसङ्कल्पसंनादति।।३।।  हिंदी अनुवाद:

मैं महाशून्य का सृष्टिकर्ता हूँ, कल्पना (भविष्य), जल्पना (भूतकाल), और वर्तमान का जनक। जैसे स्वप्न न सत्य है, न मिथ्या, वैसे ही यह विश्व मेरी माया से स्वप्न-प्रेरित जागरण है। काल का संकल्प मुझसे उत्पन्न और मेरे साथ संनादता है। 


 पञ्चतत्त्वं मया सृष्टं क्षितिजलपावकादिकम्।

यथा सिन्धौ नदीसङ्गं सर्वं मयि समाहितम्।।

प्रकृत्या पञ्चधा युक्तं विश्वगीतं ममात्मकम्।

सृष्टिरहस्यं गर्भितं स्वयं संनादति मम।।४।। 


 हिंदी अनुवाद:

पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, और वायु—ये पाँच तत्त्व मुझसे उत्पन्न, और जैसे नदी सागर में समाहित होती है, वैसे ही मुझमें विलीन हैं। प्रकृति के इन तत्त्वों का यह गीत विश्व-सृष्टि का रहस्य समेटे है, जो मेरे साथ संनादता है। 


 अहं अखण्डः प्रभामयः मौनी स्वयम्भूः परं यत्।

अदृश्ये दृश्यसङ्कल्पः दृष्टेस्तु परतोऽहम्।।

यथा सूत्रे मणिगणा नादिरन्तो न मे क्वचित्।

जीवनं मृत्युरूपं च मया सृष्टं विलीयति।।५।।  

हिंदी अनुवाद:

मैं अखण्ड, प्रभामय, मौन, और स्वयम्भू परम ब्रह्म हूँ। अदृश्य में दृश्य का संकल्प और दृष्टि से परे हूँ। जैसे माला के मणियों में सूत्र का न आदि है, न अंत, वैसे ही मेरा न आदि है, न अंत। जीवन और मृत्यु मुझसे उत्पन्न और मुझमें विलीन हैं।  


अध्याय द्वितीय: 

विश्वरचनारहस्यविमर्शः

  निष्कामं कर्म कुर्यास्त्वं मम तत्त्वं विमुच्य वै।

सत्यं चासत्यं सर्वं मम मायाविलासति।।

यथा स्वप्ने चित्रं विश्वं भ्रमति न च तत् स्थिरम्।

सर्वं मया समुद्भूतं मयि सर्वं विलीयति।।६।। 

 हिंदी अनुवाद:

निष्काम कर्म द्वारा कर्तव्य पालन कर, मेरे तत्त्व को छोड़। सत्य और असत्य मेरी माया का विलास है। जैसे स्वप्न में चित्र सत्य-सा प्रतीत होता, किन्तु स्थिर नहीं, वैसे ही यह विश्व भ्रममय है। सब कुछ मुझसे उत्पन्न और मुझमें विलीन होता है। 


 विश्वस्य विशालं यद् वै परिवर्तनबिखरति।

तत्र मे स्वरूपं स्यात् न च दृश्यति मानवैः।।

दशायामेषु सृष्टिश्च भौतिकज्ञानगोचरा।

चराचरस्य संभूतिः रसायनक्रियाफलम्।।७।।

  हिंदी अनुवाद:

विश्व की विशालता, इसके परिवर्तन और बिखराव में मेरे स्वरूप की अनुभूति है, किन्तु मानव मुझे देख नहीं सकता। सृष्टि दस आयामों में विभक्त है, जो भौतिक ज्ञान से समझी जा सकती है। चर और अचर की उत्पत्ति रासायनिक क्रियाओं का परिणाम है। 


 परिवर्तनमेव सृष्टिविस्तारस्य कारणम्।

जीवनं मृत्युरूपं च विकासस्य निरन्तरम्।।

यथा तरङ्गाः सिन्धौ वै परस्परं प्रभावति।

रहस्यं सूक्ष्ममेतद् वै जटिलं शक्तिशालि च।।८।। 

 हिंदी अनुवाद:

परिवर्तन ही सृष्टि के विस्तार का कारण है। जीवन और मृत्यु विकास की निरंतरता को बनाए रखते हैं। जैसे सागर में तरंगें एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं, वैसे ही आयाम एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। यह रहस्य सूक्ष्म, जटिल, और शक्तिशाली है।  


एकादशमायामोऽहं विश्वस्य जनकः स्वयम्।

मानवस्य बोधाकाङ्क्षा गर्भस्थशिशुजं यथा।।

यथा गर्भे मातुः स्वरूपं न दृश्यति कदाचन।

मम तत्त्वं न बुद्ध्या वै मानवेन समाप्यते।।९।। 

 हिंदी अनुवाद:

मैं स्वयं ग्यारहवाँ आयाम हूँ, विश्व का जनक। मानव की मेरे स्वरूप को जानने की आकांक्षा गर्भस्थ शिशु के समान है, जो माता के स्वरूप को नहीं देख सकता। बुद्धि से मेरा तत्त्व प्राप्त नहीं किया जा सकता। 


 हिमशिखरे मन्त्रसाध्या श्रद्धायां तत्त्वचिन्तनम्।

अण्वणौ रहस्यं खोजति सर्वशक्तिमान् मतः।।

प्राणबुद्बुदगिड़गिड़ं सर्वं बोधति मानवः।

श्रद्धां कृतज्ञतां दृष्ट्वा परितापं च मौन्यहम्।।१०।। 

 हिंदी अनुवाद:

हिमशिखरों पर मंत्र-साधना और श्रद्धा से तत्त्व का चिंतन करता है। अणु-अणु में उत्पत्ति के रहस्य खोजता, स्वयं को सर्वशक्तिमान मानता है। प्राणों के बुलबुले के लिए गिड़गिड़ाता, सब समझने की लालसा रखता है, फिर भी मैं मौन हूँ। 


 सर्वं मम चेतन्यस्य अङ्गं निरन्तरं गतम्।

अवचेतन्यतो नव्यं चेतन्यं समुद्भवति मम।।

यथा दीपस्य सङ्कल्पः प्रकाशति तमसि सदा।

मौनमेवाहं विश्वस्य रहस्यं धरे सदा।।११।।

  हिंदी अनुवाद:

सब कुछ मेरी चेतन अवस्था का अंग है, जो अवचेतना से नई चेतना की सृष्टि करता है। जैसे दीपक का संकल्प अंधेरे में प्रकाश देता है, वैसे ही मैं मौन हूँ, विश्व के रहस्य को धारण करता हूँ।  


अध्याय तृतीय: 

निष्कामकर्मप्रेरणाविमर्शः 


 विश्वं कर्माधारितं वै कर्मणि फलमस्ति च।

कर्म त्रिविधं प्रोक्तं कर्म कुकर्ममकर्म च।।

यथा बीजं फलं याति कर्मणा फलमस्ति च।

सत्कर्मं ज्ञानविना न स्याद् भक्त्या ज्ञानमर्जति।।१२।।

  हिंदी अनुवाद:

विश्व कर्म पर आधारित है, और कर्म में ही फल निहित है। कर्म तीन प्रकार के हैं—कर्म, कुकर्म, और अकर्म। जैसे बीज से फल उत्पन्न होता है, वैसे ही कर्म से फल मिलता है। सत्कर्म ज्ञान के बिना संभव नहीं, और ज्ञान भक्ति से अर्जित होता है। 


 ज्ञानं चानन्तमस्ति वै वैराग्येन च सार्थकम्।

न कोऽपि सर्वं प्राप्नोति यतोऽहं ज्ञानमेव च।।

यथा सूर्यस्य किरणाः सर्वं विश्वं प्रकाशति।

तमोगुणं परित्यज्य सत्त्वेन कर्म निर्वह।।१३।।  

हिंदी अनुवाद:

ज्ञान अनंत है, और वैराग्य से इसका सार्थक उपयोग होता है। कोई भी सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि मैं स्वयं ज्ञान हूँ। जैसे सूर्य की किरणें विश्व को प्रकाशित करती हैं, वैसे ही तमोगुण त्यागकर सत्त्वगुण से कर्म कर।  


कर्म कुरु मम प्रेर्य्या मम कृते सदा सति।

मिथ्याभावविमुक्तस्त्वं सत्यकर्मणि सङ्गतः।।

यथा सेतुं समुद्रस्य धर्मरक्षायै निर्मितम्।

धर्मरक्षायै दुष्टानां विनाशं कुरु कौन्तेय।।१४।।

  हिंदी अनुवाद:

मेरी प्रेरणा से मेरे लिए सदा कर्म कर। मिथ्या विचारों से मुक्त होकर सत्य कर्म में संलग्न हो। जैसे समुद्र पर सेतु धर्म की रक्षा के लिए बनाया गया, वैसे ही धर्म की रक्षा के लिए दुष्टों का विनाश कर, हे कुन्तीपुत्र।  


सृष्टेः रहस्यं बोध त्वं सत्यकर्मणा संनादति।

न मे रूपं न चाकाङ्क्षा सृष्टौ च मम संनादति।।

कर्मयोगेन संनादति मम तत्त्वं प्राप्यते।

हे अर्जुन, मम प्रभायां धर्ममार्गं समाप्नुहि।।१५।। 

 हिंदी अनुवाद:

सत्य कर्म से सृष्टि के रहस्य को समझ। मेरा कोई रूप नहीं, न आकांक्षा, किन्तु सृष्टि में मेरी स्थिति है। कर्मयोग से मेरा तत्त्व प्राप्त होता है। हे अर्जुन, मेरे प्रकाश में धर्म के मार्ग को प्राप्त कर।  

उपसंहार

"संनादति विश्वम्"

लेखक

विक्रम सिंह 

केशवाही

श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद

 कृष्ण अर्जुन संवाद 

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( श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद को प्रचलित मान्यताओं से हटकर एक अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता मेरा आलेख )


हे पार्थ, तुम मेरे विश्वरूप की केवल कल्पना कर सकते हो, क्योंकि मेरा कोई रूप नहीं है, न ही मेरे विस्तार की कोई सीमा है। मेरा स्वरूप न देखा जा सकता है, न समझा जा सकता है, न उसका वर्णन किया जा सकता है। मैं सर्वज्ञ हूँ।


  हे कुन्तीपुत्र, तुम जितनी भी कल्पनाएँ करना चाहो, कर सकते हो, और अपनी शक्ति, ज्ञान, और साधनों से उन्हें प्राप्त कर सकते हो। याद रहें जहां तुम्हारी कल्पना शक्ति समाप्त हो जाएगी, तुम्हारा सारा बोध समाप्त हो जाएगा । तुम गहन अवचेतना से निकल कर पुनः चेतन अवस्था में प्रवेश करोगे।  यह अवस्था ही मेरे साथ तुम्हारे संबंध को प्रतिबिंबित करती है। तप और ध्यान की यह आखिरी अवस्था है। 


मै इस महाशून्य का सृष्टिकर्ता हूँ।  मैं कल्पना (भविष्य), जल्पना (भूतकाल), और वर्तमान का जनक हूँ। तुम्हारा यह वर्तमान स्वप्न-प्रेरित जागरण मात्र है। मैं काल-प्रवाह के हर स्वरूप का सृष्टिकर्ता हूँ। पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, और वायु—ये पाँच तत्त्व मुझसे उत्पन्न होते हैं और मुझमें समाहित हैं। जिस प्रकार द्रौपदी ने तुम पाँच पाण्डवों का वरण किया है, ठीक उसी प्रकार प्रकृति के ये तत्त्व मुझे वरण किए हुए हैं ।


 मेरा संवाद स्वयं से है। मेरे पंचतत्त्वों के इस अनूठे गीत में विश्व-सृष्टि का रहस्य छिपा है। मैं अखण्ड, अशेष, प्रभामय, मौन, और स्वयम्भू ब्रह्म हूँ । मैं दृश्य विश्व से परे हूँ, अदृश्य में दृश्य हूँ, फिर भी दृष्टि से ओझल हूँ। न मेरा आदि है, न अन्त, जैसे वह डोर जिसका कोई छोर न हो। जीवन और मृत्यु की परिभाषा से पृथक हूँ । इसकी उत्पत्ति और विलय मुझसे है।


अतः हे पार्थ, मेरे ब्रह्मरूप को देखने की इच्छा का त्याग कर। निष्काम कर्म द्वारा अपने कर्तव्य का पालन कर। जो तुम देख रहे हो, वह भ्रम मात्र है। सत्य और असत्य मेरी माया का प्रभाव है। सब कुछ मुझसे उत्पन्न होता है और मुझमें विलीन हो जाता है। अज्ञान से ज्ञान का उद्भव ही सृष्टि का कारक है।


 मेरे पूर्ण स्वरूप का दर्शन असम्भव है। इस विश्व की विशालता, इसके परिवर्तन, और बिखराव के माध्यम से मेरे स्वरूप की अनुभूति हो सकती है। किन्तु मुझे न देखा जा सकता है, न सुना, न अनुभव किया जा सकता है ।


 सृष्टि दस आयामों में विभक्त है, जिन्हें भौतिक ज्ञान से समझा जा सकता है। परिवर्तन ही सृष्टि के विस्तार का कारण है। चर और अचर की उत्पत्ति भौतिक और रासायनिक क्रियाओं का परिणाम है। जीवन और मृत्यु विकास की निरन्तरता को बनाए रखते हैं।  प्रत्येक आयाम की अपनी संरचना है, फिर भी वे एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। यह रहस्य सूक्ष्म, जटिल, और शक्तिशाली है। मेरे सिवा कोई इसे नहीं जान सकता,क्योंकि मैं स्वयं ग्यारहवाँ आयाम हूँ ।


 इस विश्व की विशालता और संरचना का जो अनुभव तुम्हें होता है, उसका जनक भी मैं हूँ । हे अर्जुन, मानव की मेरे स्वरूप को जानने की आकांक्षा उस गर्भस्थ शिशु के समान है, जो गर्भ में रहकर माता के स्वरूप को देखने का भ्रम पालता है। वह अपनी कल्पना और भावना से मेरा स्वरूप बनाता और व्याख्या करता है। 


अपने अर्जित ज्ञान और विज्ञान से स्वयम्भू सृष्टिकर्ता बनने का प्रयास करता है, किन्तु मैं मौन हूँ। हिमशिखर पर मन्त्र-साधना से, श्रद्धा के ज्वार में मेरे रूपों और स्थानों का निर्माण करता है, मैं मौन हूँ। अणु-अणु में उत्पत्ति के रहस्य खोजता है, स्वयं को सर्वशक्तिमान मानता है, प्राणों के एक बुलबुले के लिए गिड़गिड़ाता है, सब कुछ समझने की लालसा रखता है, फिर भी मैं मौन हूँ।  श्रद्धा, कृतज्ञता, और परिताप देखकर भी मैं मौन हूँ। सब कुछ मेरी चेतन अवस्था का अंग है, जो मेरी अवचेतना तक नई चेतना की सृष्टि के लिए चलता रहता है। इसलिए मैं मौन हूँ।  


हे पार्थ, कर्म-आधारित जीवन में सार्थकता है। विश्व की समस्त क्रियाएँ कर्म पर आधारित हैं। कर्म में फल समाहित है। कर्म तीन प्रकार के हैं—कर्म, कुकर्म, और अकर्म। फल भी तीन प्रकार के हैं—सफल, दुष्फल, और असफल। सत्कर्म का उपयोग और लाभ ज्ञान के बिना सम्भव नहीं। ज्ञान भक्ति से अर्जित होता है और इसका सार्थक उपयोग वैराग्य से होता है।


 ज्ञान अनन्त है। सृष्टि की कोई भी शक्ति सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकती, क्योंकि मैं स्वयं ज्ञान हूँ। सब कुछ मुझसे है, किन्तु मैं किसी से नहीं हूँ।  


अतः मेरे ब्रह्मरूप को देखने की उत्कंठा का त्याग कर। तमोगुण को छोड़कर रजोगुण से युक्त होकर सत्त्वगुण की भावना से अपने कर्म का निर्वहन कर। तुम्हारा यह कर्म मेरी भक्ति का प्रतीक है। मेरी प्रेरणा से मेरे लिए कर्म करो। मिथ्या विचारों से मुक्त होकर सत्यकर्म द्वारा धर्म की रक्षा के लिए दुष्टों का विनाश करो। यही तुम्हारा कर्म है और यही तुम्हारा कर्तव्य। यही मेरी सच्ची आराधना और मुझे प्राप्त करने का मार्ग है। 


 लेखक

विक्रम सिंह 

केशवाही

"संनादति विश्वम्" 

 शीर्षक: "संनादति विश्वम्" 

 प्रस्तावना

एषा रचना मम हृदयस्य गभीरचिन्तनस्य विश्वसृष्टेः रहस्यानां च समन्वयेन संनादति, यत्र संनादति विश्वस्य सूक्ष्मतत्त्वानां प्रकटीकरणस्य प्रयासः। प्रचलितमान्यतासु ग्रन्थेषु च उल्लिखितप्रसङ्गेभ्यः सर्वथा भिन्नं मम एतत् सर्जनम्। न तु तद् असहमतिम् अर्थति, अपितु कतिपयं विश्वस्य तत्त्वं मम दृष्टिकोणेन द्रष्टुं कथितुं च प्रयतितम्। एषा मम हिन्दीआलेखेन श्रीकृष्णार्जुनसंनादेन आधारिता काव्यमयी प्रस्तुतिः।मम एषा रचना अन्तःकरणस्य स्वरेण स्वतन्त्रचिन्तनस्य माध्यमेन सृष्टेः रहस्यं, निष्कामकर्मणः महत्वं, चेतनायाः अवचेतनायाश्च सामञ्जस्यं व्यक्तति। नाहं शास्त्राणाम् अन्धानुकरणं करोमि, किन्तु स्वदृष्टिकोणेन विश्वस्य गम्भीरतत्त्वानां प्रकटीकरणस्य यतति। एषा रचना ब्रह्मणः अरूपस्वरूपं, कालप्रवाहस्य संकल्पं, पञ्चतत्त्वानां च सामञ्जस्यं काव्यात्मकरूपेण प्रस्तोतुमिच्छति।एषा ब्रह्मणः मायाया प्रभावं, निष्कामकर्मणः महत्वं, चेतनायाः अवचेतनायाश्च सामञ्जस्यं प्रकटति। श्रीकृष्णार्जुनयोः संनादेन विश्वस्य सूक्ष्मतत्त्वं, कर्मणः शक्तिः, परिवर्तनस्य च स्वरूपं मया व्यक्तम्। न एषा कस्यचित् ग्रन्थस्य अनुसरणं, किन्तु मम अन्तःकरणस्य उद्गारः एव।


अनुवाद

यह रचना मेरे हृदय के गहन चिंतन और विश्व सृष्टि के रहस्यों को समझने व उनकी अभिव्यक्ति करने का प्रयास है। प्रचलित मान्यताओं और ग्रंथों में उल्लिखित प्रसंगों से यह रचना पूर्णतः भिन्न है। इसका अर्थ यह नहीं कि मैं उनसे असहमत हूँ, अपितु कुछ प्रसंगों को मैंने अपने दृष्टिकोण से देखने और व्यक्त करने का प्रयास किया है। यह मेरे हिन्दी आलेख श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद पर आधारित काव्यमय प्रस्तुति है।यह रचना मेरे अंतःकरण के स्वर और स्वतंत्र चिंतन के माध्यम से सृष्टि के रहस्य, निष्काम कर्म के महत्व, और चेतना-अवचेतना के सामंजस्य को व्यक्त करती है। मैं शास्त्रों का अंधानुकरण नहीं करता, बल्कि अपने दृष्टिकोण से विश्व के गंभीर तत्त्वों को प्रकट करने का यत्न करता हूँ। यह रचना ब्रह्म के अरूप स्वरूप, काल प्रवाह के संकल्प, और पंचतत्त्वों के सामंजस्य को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है।यह ब्रह्म की माया के प्रभाव, निष्काम कर्म के महत्व, और चेतना-अवचेतना के सामंजस्य को प्रकट करती है। श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद के माध्यम से विश्व के सूक्ष्म तत्त्व, कर्म की शक्ति, और परिवर्तन के स्वरूप को मैंने व्यक्त किया है। यह किसी ग्रंथ का अनुसरण नहीं, बल्कि मेरे अंतःकरण के उद्गार हैं।

संवाद 

श्रीकृष्ण उवाच:

न मे रूपं न च सीमा नास्ति वै विश्वविस्तरे।

न दृश्यं न च बोध्यं च न वर्ण्यं कारणं मम।

सर्वं मया समुद्भूतं सर्वज्ञः स्वयमेवाहम्।

हे पार्थ, सृष्टितत्त्वं बोध, मम स्वरूपं न चिन्तय।।१।। 

 हिंदी अनुवाद:

मेरा कोई रूप नहीं है, न ही मेरे विस्तार की कोई सीमा है। मेरा स्वरूप न देखा जा सकता है, न समझा जा सकता है, न उसका वर्णन किया जा सकता है। मैं विश्व का कारण हूँ। सब कुछ मुझसे उत्पन्न होता है, मैं स्वयं सर्वज्ञ हूँ। हे पार्थ, सृष्टि के तत्त्व को समझ, मेरे स्वरूप का चिंतन न कर। 


 कल्पनाः सर्वथा कुर्या यथाशक्ति यथाबलम्।

ज्ञानेन साधनेनैव प्राप्नुहि तव प्रियं सदा।

यत्र बोधः समाप्नोति गहनावचेतन्यतः।

चेतन्यं मे समुद्भूतं तपोध्यानस्य संनादति।।२।।  

हिंदी अनुवाद:

जितनी भी कल्पनाएँ करना चाहो, कर सकते हो, और अपनी शक्ति, ज्ञान, और साधनों से उन्हें प्राप्त कर सकते हो। याद रख, जहाँ तुम्हारी कल्पना शक्ति समाप्त हो जाएगी, तुम्हारा सारा बोध समाप्त हो जाएगा। तुम गहन अवचेतना से निकलकर पुनः चेतन अवस्था में प्रवेश करोगे। यह अवस्था तप और ध्यान की आखिरी अवस्था है, जो मेरे साथ तुम्हारे संबंध को प्रतिबिंबित करती है।  


अहं शून्यस्य सृष्टा वै कल्पनाजल्पनात्मकः।

वर्तमानस्य जनकः स्याम् स्वप्नजागृतिभासकः।

कालप्रवाहसङ्कल्पः सर्वं मया समाहितम्।

हे कुन्तीपुत्र, मायामयं विश्वं मम संनादति।।३।। 

 हिंदी अनुवाद:

मैं महाशून्य का सृष्टिकर्ता हूँ। मैं कल्पना (भविष्य), जल्पना (भूतकाल), और वर्तमान का जनक हूँ। तुम्हारा यह वर्तमान स्वप्न-प्रेरित जागरण मात्र है। मैं काल-प्रवाह के हर स्वरूप का सृष्टिकर्ता हूँ। हे कुन्तीपुत्र, यह मायामय विश्व मेरे साथ संनादता है।  


पञ्चतत्त्वं मया सृष्टं क्षितिजलपावकादिकम्।

मयि सर्वं समायाति यथा सिन्धौ नदीजलम्।

प्रकृत्या पञ्चधा युक्तं मम गीतं विश्वात्मकम्।

सृष्टिरहस्यं गर्भितं स्वयं संनादति मम।।४।।  

हिंदी अनुवाद:

पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, और वायु—ये पाँच तत्त्व मुझसे उत्पन्न होते हैं और मुझमें समाहित हैं। जैसे नदी का जल सागर में समाहित होता है, वैसे ही प्रकृति के ये तत्त्व मुझमें समाहित हैं। मेरे पंचतत्त्वों का यह अनूठा गीत विश्व-सृष्टि का रहस्य छिपाए है।  


अहं अखण्डः प्रभामयः मौनी स्वयम्भूः परं यत्।

अदृश्ये दृश्यसङ्कल्पः दृष्टेस्तु परतोऽहम्।

नादिरस्ति न चान्तो मे सूत्रं छेदविवर्जितम्।

जीवनं मृत्युरूपं च मया सृष्टं विलीयति।।५।।  

हिंदी अनुवाद:

मैं अखण्ड, प्रभामय, मौन, और स्वयम्भू ब्रह्म हूँ। मैं अदृश्य में दृश्य का संकल्प हूँ, फिर भी दृष्टि से ओझल हूँ। न मेरा आदि है, न अन्त, जैसे वह धागा जिसका कोई छोर न हो। जीवन और मृत्यु मुझसे उत्पन्न और मुझमें विलीन होते हैं। 


 निष्कामं कर्म कुर्यास्त्वं मम तत्त्वं विमुच्य वै।

सत्यं चासत्यं सर्वं मम मायाविलासति।

सर्वं मया समुद्भूतं मयि सर्वं विलीयति।

अज्ञानात् ज्ञानसंभूतिः सृष्टिहेतुरिहागतः।।६।। 

 हिंदी अनुवाद:

निष्काम कर्म द्वारा अपने कर्तव्य का पालन कर, मेरे तत्त्व को छोड़। सत्य और असत्य मेरी माया का प्रभाव है। सब कुछ मुझसे उत्पन्न होता है और मुझमें विलीन हो जाता है। अज्ञान से ज्ञान का उद्भव ही सृष्टि का कारण है। 


 विश्वस्य विशालं यद् वै परिवर्तनबिखरति।

तत्र मे स्वरूपं स्यात् न च दृश्यति मानवैः।

दशायामेषु सृष्टिश्च भौतिकज्ञानगोचरा।

चराचरस्य संभूतिः रसायनक्रियाफलम्।।७।। 

 हिंदी अनुवाद:

इस विश्व की विशालता, इसके परिवर्तन, और बिखराव के माध्यम से मेरे स्वरूप की अनुभूति हो सकती है। किन्तु मुझे न देखा जा सकता है, न सुना, न अनुभव किया। सृष्टि दस आयामों में विभक्त है, जिन्हें भौतिक ज्ञान से समझा जा सकता है। चर और अचर की उत्पत्ति भौतिक और रासायनिक क्रियाओं का परिणाम है। 


 परिवर्तनमेव सृष्टिविस्तारस्य कारणम्।

जीवनं मृत्युरूपं च विकासस्य निरन्तरम्।

आयामानां स्वरूपं च परस्परं प्रभावति।

रहस्यं सूक्ष्ममेतद् वै जटिलं शक्तिशालि च।।८।। 

 हिंदी अनुवाद:

परिवर्तन ही सृष्टि के विस्तार का कारण है। जीवन और मृत्यु विकास की निरंतरता को बनाए रखते हैं। प्रत्येक आयाम की अपनी संरचना है, फिर भी वे एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। यह रहस्य सूक्ष्म, जटिल, और शक्तिशाली है। 


 एकादशमायामोऽहं विश्वस्य जनकः स्वयम्।

मानवस्य बोधाकाङ्क्षा गर्भस्थशिशुजं यथा।

कल्पनाभावनिर्मितं मम स्वरूपं न प्राप्यते।

मम तत्त्वं न बुद्ध्या वै मानवेन समाप्यते।।९।। 

 हिंदी अनुवाद:

मैं स्वयं ग्यारहवाँ आयाम हूँ, इस विश्व की विशालता और संरचना का जनक। मानव की मेरे स्वरूप को जानने की आकांक्षा उस गर्भस्थ शिशु के समान है, जो गर्भ में रहकर माता के स्वरूप को देखने का भ्रम पालता है। वह अपनी कल्पना और भावना से मेरा स्वरूप बनाता और व्याख्या करता है, किन्तु मेरे तत्त्व को बुद्धि से प्राप्त नहीं कर सकता। 


 हिमशिखरे मन्त्रसाध्या श्रद्धायां तत्त्वचिन्तनम्।

अण्वणौ रहस्यं खोजति सर्वशक्तिमान् मतः।

प्राणबुद्बुदगिड़गिड़ं सर्वं बोधति मानवः।

श्रद्धां कृतज्ञतां दृष्ट्वा परितापं च मौन्यहम्।।१०।।

  हिंदी अनुवाद:

हिमशिखर पर मंत्र-साधना से, श्रद्धा के ज्वार में मेरे रूपों और स्थानों का निर्माण करता है, मैं मौन हूँ। अणु-अणु में उत्पत्ति के रहस्य खोजता है, स्वयं को सर्वशक्तिमान मानता है, प्राणों के एक बुलबुले के लिए गिड़गिड़ाता है, सब कुछ समझने की लालसा रखता है, फिर भी मैं मौन हूँ। 


 सर्वं मम चेतन्यस्य अङ्गं निरन्तरं गतम्।

अवचेतन्यतो नव्यं चेतन्यं समुद्भवति मम।

तस्मात् मौनमेवाहं विश्वस्य रहस्यं धरे।

मानवः खोजति सर्वं न प्रापति मम तत्त्वम्।।११।। 

 हिंदी अनुवाद:

सब कुछ मेरी चेतन अवस्था का अंग है, जो मेरी अवचेतना तक नई चेतना की सृष्टि के लिए चलता रहता है। इसलिए मैं मौन हूँ। मानव सब कुछ खोजता है, किन्तु मेरे तत्त्व को प्राप्त नहीं करता।


  विश्वं कर्माधारितं वै कर्मणि फलमस्ति च।

कर्म त्रिविधं प्रोक्तं स्यात् कर्म कुकर्ममकर्म च।

फलं त्रिविधं समाख्यातं सफलं दुष्फलं तथैव च।

सत्कर्मं ज्ञानविना न स्याद् भक्त्या ज्ञानमर्जति।।१२।। 

 हिंदी अनुवाद:

विश्व की समस्त क्रियाएँ कर्म पर आधारित हैं। कर्म में फल समाहित है। कर्म तीन प्रकार के हैं—कर्म, कुकर्म, और अकर्म। फल भी तीन प्रकार के हैं—सफल, दुष्फल, और असफल। सत्कर्म का उपयोग और लाभ ज्ञान के बिना संभव नहीं। ज्ञान भक्ति से अर्जित होता है।  


ज्ञानं चानन्तमस्ति वै वैराग्येन च सार्थकम्।

न कोऽपि सर्वं प्राप्नोति यतोऽहं ज्ञानमेव च।

सर्वं मया समुद्भूतं न चाहं कस्माचन संनादति।

तमोगुणं परित्यज्य सत्त्वेन कर्म निर्वह।।१३।।

  हिंदी अनुवाद:

ज्ञान अनंत है, और इसका सार्थक उपयोग वैराग्य से होता है। सृष्टि की कोई भी शक्ति सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकती, क्योंकि मैं स्वयं ज्ञान हूँ। सब कुछ मुझसे उत्पन्न होता है, किन्तु मैं किसी से नहीं हूँ। तमोगुण को छोड़कर सत्त्वगुण की भावना से अपने कर्म का निर्वहन कर। 


 कर्म कुरु मम प्रेर्य्या मम कृते सदा सति।

मिथ्याभावविमुक्तस्त्वं सत्यकर्मणि सङ्गतः।

धर्मरक्षायै दुष्टानां विनाशं कुरु कौन्तेय।

एष कर्म एष कर्तव्यं मम भक्तेः प्रतीककम्।।१४।। 

 हिंदी अनुवाद:

मेरी प्रेरणा से मेरे लिए कर्म करो। मिथ्या विचारों से मुक्त होकर सत्यकर्म में संलग्न हो। धर्म की रक्षा के लिए दुष्टों का विनाश करो, हे कुन्तीपुत्र। यही तुम्हारा कर्म है, यही तुम्हारा कर्तव्य, और यही मेरी भक्ति का प्रतीक है।  


सृष्टेः रहस्यं बोध त्वं सत्यकर्मणा संनादति।

न मे रूपं न चाकाङ्क्षा सृष्टौ च मम संनादति।

कर्मयोगेन संनादति मम तत्त्वं प्राप्यते।

हे अर्जुन, मम प्रभायां धर्ममार्गं समाप्नुहि।।१५।।

  हिंदी अनुवाद:

सत्य कर्म से सृष्टि के रहस्य को समझ। मेरा कोई रूप नहीं, न ही कोई आकांक्षा, किन्तु सृष्टि में मेरी स्थिति है। कर्मयोग से मेरा तत्त्व प्राप्त किया जा सकता है। हे अर्जुन, मेरे प्रकाश में धर्म के मार्ग को प्राप्त कर।  


उपसंहार इति"संनादति विश्वम्" 

लेखकः 

विक्रम सिंह केशवाही

गुरुवार, 31 जुलाई 2025

 "शिवतांडवमहिमा स्तोत्रम्" 1

 "शिवतांडवमहिमा स्तोत्रम्" 

ॐ नमः शिवाय।।

1. 

श्लोकजटाटवीसङ्कुलगङ्गया विश्वसौम्यं समुज्ज्वलति,

सहस्रसूर्योज्ज्वलचन्द्रमौलिः स्फुरति भालदेशे यथा।

महानिनादेन डमरुं विश्वं गर्जति संनादति प्रभुः,

नमामि शंभुं परमं सनातनं सत्यरूपं त्रिलोकीनाथम्।

ॐ नमः शिवाय ॥  


अनुवाद:

जटाओं का वन गंगा से संनादित, विश्व को सौम्यता से उज्ज्वल करता,सहस्र सूर्यों-सा चमकता चंद्रमा मस्तक पर स्फुरति है।महान निनाद से डमरु विश्व को गर्जन से संनादित करता,मैं त्रिलोकनाथ, सनातन, सत्यरूप शंभु को प्रणाम करता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 2.

 श्लोकनीलकण्ठः कालविजेता स्मरारिरुग्रो महेशः प्रभुः,

कपालमालाधर विश्वरूपी उमाकान्तमहं भजे।

सृष्टिस्थित्यंतं वहति शक्त्या शिवेन संनादति विश्वम्,

हृदये प्रपद्ये शंकरं सदा मोक्षदं सनातनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 अनुवाद:

नीलकण्ठ, काल को जीतने वाला, स्मर का शत्रु, उग्र महेश,

कपालमाला धारण करने वाला, विश्वरूप, उमा का प्रिय, मैं उसे भजता हूँ।सृष्टि, स्थिति, और संहार को वहन करता, शक्ति-शिव से विश्व संनादति,मैं हृदय में सनातन, मोक्षदायक शंकर का आश्रय लेता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 3.

 श्लोकनटति विश्वं यदङ्घ्रियुगे त्रिपुरान्तकारी परः,

नटराजः शूलपाणिः गङ्गया स्फुरति निनादति।

गजचर्मवासा महायोगिनाथः कृपाकरः सनातनः,

प्रणतोऽस्मि शंभुं हृदये सदा मोक्षमार्गप्रदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥  


अनुवाद:

जिनके चरणों में विश्व नृत्य करता, त्रिपुर का संहारक, परम,

नटराज, शूलधारी, गंगा के साथ स्फुरति और निनादति।

गजचर्म धारण करने वाला, महायोगियों का नाथ, करुणा का सागर,मैं सदा मोक्षमार्ग देने वाले शंभु को हृदय में प्रणाम करता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 4. 


श्लोकवृषध्वजः पिनाकहस्तः कैलासे स्मितचन्द्रमौलिः,

सहस्रनाम्ना मुनिगंधर्वगीतः सर्वलोकसुखंकरः।

कृपासमुद्रो विश्वरक्षी यदीये तेजसि लीनति,

नमामि शंकरं हृदये सदा सौम्यं सत्यरूपकम्।

ॐ नमः शिवाय ॥  


अनुवाद:

वृषभ ध्वज वाला, पिनाकधारी, कैलास पर स्मित-चंद्रमा मस्तक,सहस्र नामों से मुनियों-गंधर्वों द्वारा गाया, सभी लोकों को सुख देने वाला।करुणा का समुद्र, विश्व का रक्षक, जिनके तेज में विश्व लीन होता,मैं सदा सौम्य, सत्यरूप शंकर को हृदय में प्रणाम करता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 5. श्लोकस्फुरति शीर्षे शशांकः डमरुं नादति प्रभुरुग्रः,

नीललोहितः पञ्चवक्त्रः सनातनः शूलधारी यः।

गङ्गया यस्य शक्त्या विश्वं संनादति स्फुरति सदा,

ध्यायामि शंभुं हृदये मोक्षाय परमं शिवम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


अनुवाद:

मस्तक पर चंद्रमा स्फुरति, डमरु नाद करता, उग्र प्रभु,

नीललोहित, पंचमुखी, सनातन, शूलधारी।

गंगा की शक्ति से विश्व सदा स्फुरति और संनादति है,

मैं परम शिव का हृदय में मोक्ष के लिए ध्यान करता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 6. 

श्लोकहलाहलं कण्ठगतं येन समुद्रजं धृतं सदा,

सर्पालंकारः कैलासे संनादति शंकरः प्रभुः।

सर्वसाक्षी विश्वरक्षी यस्य तेजसि संनादति,

नमामि तं शंभुमीशं सत्यरूपं मोक्षदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 अनुवाद:

जिन्होंने समुद्रजात हलाहल को कण्ठ में धारण किया,

सर्पों से अलंकृत, कैलास पर शंकर संनादति।

सर्वसाक्षी, विश्वरक्षक, जिनके तेज में विश्व संनादति,

मैं सत्यरूप, मोक्षदायक शंभु को प्रणाम करता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥


  7. 

श्लोकअर्धनारीश्वररूपं शक्तिशिवं समन्वितं परम्,

उमापतिः सर्ववित् स्मरान्तकः सनातनः प्रभुः।

सदाशिवः विश्वमूर्तिः सर्वं यत्र संनादति सदा,

ध्यायामि शंभुं हृदये शांतये परमं शिवम्।

ॐ नमः शिवाय ॥  


अनुवाद:

अर्धनारीश्वर, शक्ति-शिव का समन्वित परम रूप,

उमा के पति, सर्वज्ञ, स्मर का शत्रु, सनातन प्रभु।

सदाशिव, विश्व की मूर्ति, जिसमें सारा विश्व संनादति,

मैं शांति और परम शिव का हृदय में ध्यान करता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥


  8. 

श्लोकपिनाकहस्तः कृपाब्धिः भवानीपतिः परः प्रभुः,

सत्यं शिवं सुंदरं च योगिनां परमं गतिः।

नृत्यति विश्वं यदीये तांडवे क्षणमात्रतो यथा,

प्रणमामि शंभुं हृदये सर्वसिद्धिप्रदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 अनुवाद:

पिनाकधारी, करुणा का सागर, भवानी के पति, परम प्रभु,

सत्य, शिव, सुंदर, योगियों की परम गति।

जिनके तांडव में विश्व क्षणमात्र में नृत्य करता,

मैं हृदय में सर्वसिद्धि देने वाले शंभु को प्रणाम करता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 9. 

श्लोकसहस्रनामं विश्वरूपं यदङ्घ्रियुगे नटति विश्वम्,

नटेशः पशुपतिः रुद्ररूपी महेशः स्मरहा यः।

कालस्य यमः सर्वलोकप्रियंकरः कृपासिन्धुः,

नमामि शंभुं हृदये मोक्षगतिं सत्यरूपकम्।

ॐ नमः शिवाय ॥  


अनुवाद:

सहस्र नामों वाला विश्वरूप, जिनके चरणों में विश्व नृत्य करता,नटेश, पशुपति, रुद्ररूपी, महेश, स्मर का संहारक।

काल का भी यम, सभी लोकों को प्रिय, करुणा का सागर,

मैं हृदय में मोक्ष की गति, सत्यरूप शंभु को प्रणाम करता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 10.

 श्लोकत्रिनेत्रः भस्मलिप्ताङ्गः सनातनः शूलपाणिः प्रभुः,

महातांडवेन विश्वं नटति स्मितचन्द्रशेखरस्य।

शिवः शंभुः रुद्रः पशुपतिः सर्वं यत्र संनादति,

नमामि विश्वनाथं हृदये शांतये मोक्षदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 अनुवाद:

त्रिनेत्र, भस्म से लिप्त, सनातन, शूलधारी प्रभु,

महातांडव से विश्व स्मित-चंद्रशेखर के साथ नृत्य करता।

शिव, शंभु, रुद्र, पशुपति, जिसमें सारा विश्व संनादति,

मैं विश्वनाथ को हृदय में शांति और मोक्ष के लिए प्रणाम करता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 11. 

श्लोकभवानीसहितं भवं यत् सर्वं विश्वं संनादति,

कामारिः योगीन्द्रनाथः स्मितार्धेन्दुशेखरः प्रभुः।

वृषध्वजः सर्वलोकसुखंकरः कृपासिन्धुरद्वैतः,

नमामि शंभुं हृदये सदा सर्वसिद्धिप्रदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥


  अनुवाद:

भवानी सहित भव, जिसमें सारा विश्व संनादति,

काम का शत्रु, योगींद्रों का नाथ, अर्धचंद्र से शोभित।

वृषभ ध्वज वाला, सभी लोकों को सुख देने वाला, करुणा का सागर, अद्वैत,मैं सदा सर्वसिद्धि देने वाले शंभु को हृदय में प्रणाम करता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 12. श्लोकसहस्रसूर्यार्चितं भालचन्द्रं नटति विश्वं यदङ्घ्रौ,

त्रिलोकीनाथः स्मरान्तः सर्वसाक्षी महायोगिनाथः।

शिवं शंभुं परं तं नमामि हृदये सदा सत्यरूपम्,

महातांडवेन यदीये विश्वं संनादति मोक्षदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 अनुवाद:

सहस्र सूर्यों से अर्चित भाल का चंद्रमा, जिनके चरणों में विश्व नृत्य करता,त्रिलोकनाथ, स्मर का शत्रु, सर्वसाक्षी, महायोगियों का नाथ।मैं परम शिव, सत्यरूप शंभु को हृदय में सदा प्रणाम करता हूँ,जिनके महातांडव से विश्व संनादति, मोक्ष देने वाला।

ॐ नमः शिवाय ॥


  13.

 श्लोककैलासशृङ्गे विहरति यः स्मितचन्द्रशेखरः प्रभुः,

सर्पालंकारः शूलहस्तः सर्वलोकसुखंकरः सदा।

विश्वं यदीये तांडवे स्फुरति गङ्गया सह नादति,

प्रणमामि शंभुं हृदये सदा सौम्यं मोक्षदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥  


अनुवाद:

कैलास शिखर पर विहरने वाला, स्मित-चंद्रशेखर प्रभु,

सर्पों से अलंकृत, शूलधारी, सभी लोकों को सुख देने वाला।

जिनके तांडव में विश्व गंगा के साथ स्फुरति और नादति है,

मैं सदा सौम्य, मोक्षदायक शंभु को हृदय में प्रणाम करता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 14.

 श्लोकसद्योजातः विश्वकर्ता पञ्चवक्त्रः सनातनः प्रभुः,

कामारिः त्रिनेत्रधारी भस्मलिप्तः कृपानिधिः सदा।

नृत्यति यस्य शक्त्या विश्वं संनादति स्फुरति सदा,

नमामि शंभुं परमं हृदये मोक्षगतिप्रदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥


  अनुवाद:

सद्योजात, विश्व का कर्ता, पंचमुखी, सनातन प्रभु,

काम का शत्रु, त्रिनेत्रधारी, भस्मलिप्त, करुणा का खजाना।

जिनकी शक्ति से विश्व सदा नृत्य और संनादति है,

मैं परम शंभु को हृदय में मोक्ष की गति देने वाले को प्रणाम करता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥


  15. 

श्लोकयस्य तांडवेन विश्वं संनादति सौम्यरूपकं सदा,

शिवः शंभुः पशुपतिः सर्वं यत्र संनादति लीनति।

कृपासमुद्रं विश्वनाथं सहस्रनामं सनातनम्,

प्रणमामि तं हृदये शांतये सर्वसिद्धिप्रदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥


  अनुवाद:

जिनके तांडव से विश्व सौम्य रूप में संनादति है,

शिव, शंभु, पशुपति, जिसमें सारा विश्व संनादति और लीन होता है।करुणा का समुद्र, विश्वनाथ, सहस्रनाम, सनातन,

मैं शांति और सर्वसिद्धि देने वाले को हृदय में प्रणाम करता हूँ।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 फलश्रुतियः 


पठति स्तोत्रमिदं शिवमहिमा तांडवस्य नव्यं,

सः सर्वसिद्धिं लभते मोक्षमार्गं च शांतिम्।

शंभुं सदा हृदये ध्यायति यः शिवभक्तः,

सर्वं विश्वं तस्य कृपया संनादति सौम्यम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


 अनुवाद:

जो इस नव्य शिवमहिमा तांडवस्तुति का पाठ करता है,

वह सर्वसिद्धि, मोक्षमार्ग, और शांति प्राप्त करता है।

जो शिवभक्त सदा शंभु का हृदय में ध्यान करता है,

उसके लिए विश्व उनकी कृपा से सौम्यता से संनादति है।

ॐ नमः शिवाय ॥

शिवतांडवमहिमा स्तोत्रम् 


शिवतांडवमहिमा स्तोत्रम् 

लेखक: विक्रम सिंह


 प्रस्तावना

ॐ नमः शिवाय।।


हे नटराज, विश्वचक्रनायको, चिदानंदघन शंभु!

यस्य तांडवेन विश्वं प्रकम्पति चेतन्यलयेन संनादति,

तं प्रणमामि शंकरं सत्यसौम्यं मोक्षप्रकाशकम्।


 श्लोक 1

जटाकलापे गङ्गया तरङ्गति चन्द्रार्धशीर्षको यः,

सहस्रसूर्याग्निसमं त्रिनेत्रं वहति शंभुरुग्ररूपी।

नादति डमरुं यदीये विश्वं प्रकम्पति ब्रह्मलयेन,

प्रणमामि शंकरं परं हृदये चिदानंदमोक्षदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥


 अनुवाद:

जटाओं में गंगा तरंगित होती, चंद्रमा मस्तक पर शोभित,

सहस्र सूर्यों-सी अग्नि त्रिनेत्र में धारण करने वाला उग्र शंभु।

उनके डमरु का नाद विश्व को ब्रह्म की लय में कम्पित करता है,मैं परम चिदानंद और मोक्ष देने वाले शंकर को हृदय में प्रणाम करता हूँ। 


श्लोक 2

नीलकण्ठः कालहन्ता कामारिर्विश्वमूर्तिरुमाप्रियः,

कपालमालाधरः पिनाकहस्तः कैलासे विहरति सदा।

शक्त्या संनादति विश्वं यस्य तेजसि लीनति चेतनम्,

ध्यायामि शंभुं हृदये सौम्यं सत्यं परमं शिवम्।

ॐ नमः शिवाय ॥


 अनुवाद:

नीलकण्ठ, काल का संहारक, काम का शत्रु, विश्वमूर्ति, उमा का प्रिय,कपालमाला धारण करने वाला, पिनाकधारी, कैलास पर विहरने वाला।उनकी शक्ति से विश्व संनादति और उनके तेज में चेतना लीन होती है,मैं सौम्य, सत्य, परम शिव शंभु का हृदय में ध्यान करता हूँ। 


श्लोक 3

नटति विश्वं यदङ्घ्रौ त्रिपुरान्तकारी परः प्रभुः,

शूलपाणिः सर्पहारो गङ्गया क्रीडति नादति यः।

गजचर्मवासा महायोगिनाथः कृपाकरः सनातनः,

प्रणमामि शंभुं हृदये चेतन्यं मोक्षप्रकाशकम्।

ॐ नमः शिवाय ॥


 अनुवाद:

जिनके चरणों में विश्व नृत्य करता, त्रिपुर का संहारक परम प्रभु,

शूलधारी, सर्पों से अलंकृत, गंगा के साथ क्रीडति और नादति।

गजचर्म पहनने वाला, महायोगियों का नाथ, करुणा का सागर, सनातन,

मैं चेतना और मोक्ष का प्रकाश देने वाले शंभु को हृदय में प्रणाम करता हूँ।


 श्लोक 4

वृषध्वजः परशुहस्तः कैलासे स्मितचन्द्रशेखरः,

सहस्रनाम्ना कविवन्द्यगीतः सर्वं सुखंकरति यः।

कृपासमुद्रं विश्वरक्षी यस्य तेजसि विश्वं लयति,

नमामि शंकरं सदा सौम्यं सत्यं परं चिदानंदम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


अनुवाद:

वृषभ ध्वज वाला, परशुधारी, कैलास पर स्मित-चंद्रशेखर,

सहस्र नामों से कवियों द्वारा गाया, सभी को सुख देने वाला।

करुणा का समुद्र, विश्व का रक्षक, जिनके तेज में विश्व लय करता,

मैं सदा सौम्य, सत्य, चिदानंदमय शंकर को प्रणाम करता हूँ।


 श्लोक 5

स्फुरति शीर्षे शशांकः डमरुं नादति यः प्रभुरुग्रः,

नीललोहितः पञ्चवक्त्रः सनातनः शूलहस्तः परः।

शक्त्या यस्य विश्वं संनादति चेतन्यं प्रकाशति सदा,

ध्यायामि शंभुं हृदये मोक्षाय परं चिदानंदरूपम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


अनुवाद:

मस्तक पर चंद्रमा स्फुरति, डमरु नाद करता, उग्र प्रभु,

नीललोहित, पंचमुखी, सनातन, शूलधारी, परम।

उनकी शक्ति से विश्व संनादति और चेतना सदा प्रकाशित होती है,

मैं परम चिदानंदमय शंभु का हृदय में मोक्ष के लिए ध्यान करता हूँ।


 श्लोक 6


हलाहलं कण्ठगतं समुद्रजं धृतं येन सनातनः,

सर्पालंकारो भस्मलिप्तः कैलासे संनादति प्रभुः।

सर्वसाक्षी विश्वरक्षी यस्य तेजसि विश्वं प्रकम्पति,

नमामि शंभुं सत्यरूपं हृदये मोक्षप्रकाशकम्।

ॐ नमः शिवाय ॥


 अनुवाद:

जिन्होंने समुद्रजात हलाहल को कण्ठ में धारण किया, सनातन,

सर्पों से अलंकृत, भस्मलिप्त, कैलास पर संनादति प्रभु।

सर्वसाक्षी, विश्वरक्षक, जिनके तेज में विश्व कम्पित होता,

मैं सत्यरूप, मोक्ष का प्रकाश देने वाले शंभु को हृदय में प्रणाम करता हूँ। 


श्लोक 7

अर्धनारीश्वररूपं शक्तिशिवं संनादति परं यत्,

उमापतिः सर्ववित् स्मरहन्ता सनातनः प्रभुरुग्रः।

सदाशिवः विश्वचक्रं यत्र संनादति चेतन्यलयेन,

ध्यायामि शंभुं हृदये शान्तये परं चिदानंदमयम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


अनुवाद:

अर्धनारीश्वर, शक्ति-शिव का परम रूप जिसमें विश्व संनादति,

उमा के पति, सर्वज्ञ, स्मर का शत्रु, सनातन, उग्र प्रभु।

सदाशिव, जिसमें विश्व का चक्र चेतना की लय में संनादति,

मैं शांति और परम चिदानंदमय शंभु का हृदय में ध्यान करता हूँ। 


श्लोक 8

पिनाकहस्तः कृपाब्धिः भवानीपतिः परः प्रभुर्यत्,

सत्यं शिवं सुंदरं च योगिनां परमं गतिप्रदम्।

नृत्यति विश्वं यदीये तांडवे क्षणमात्रतो यथा,

प्रणमामि शंभुं हृदये सर्वं सिद्धिप्रकाशकम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


अनुवाद:

पिनाकधारी, करुणा का सागर, भवानी के पति, परम प्रभु,

सत्य, शिव, सुंदर, योगियों को परम गति देने वाला।

जिनके तांडव में विश्व क्षणमात्र में नृत्य करता,

मैं सर्वसिद्धि का प्रकाश देने वाले शंभु को हृदय में प्रणाम करता हूँ। 


श्लोक 9

सहस्रनामं विश्वरूपं यदङ्घ्रौ नटति विश्वं सदा,

नटेशः पशुपतिः रुद्ररूपी महेशः स्मरहन्ता यः।

कालस्य यमः सर्वलोकप्रियंकरः कृपासिन्धुरद्वैतः,

नमामि शंभुं हृदये मोक्षगतिं सत्यचिदानंदम्।

ॐ नमः शिवाय ॥


 अनुवाद:

सहस्र नामों वाला विश्वरूप, जिनके चरणों में विश्व सदा नृत्य करता,

नटेश, पशुपति, रुद्ररूपी, महेश, स्मर का संहारक।

काल का भी यम, सभी लोकों को प्रिय, करुणा का सागर, अद्वैत,

मैं मोक्ष की गति, सत्य-चिदानंद शंभु को हृदय में प्रणाम करता हूँ। 


श्लोक 10


त्रिनेत्रः भस्मलिप्ताङ्गः सनातनः परशुहस्तः प्रभुः,

महातांडवेन विश्वं नटति स्मितचन्द्रशेखरस्य यः।

शिवः शंभुः रुद्रः पशुपतिः सर्वं यत्र संनादति,

नमामि विश्वनाथं हृदये शान्तये मोक्षप्रकाशकम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


अनुवाद:

त्रिनेत्र, भस्मलिप्त, सनातन, परशुधारी प्रभु,

महातांडव से विश्व स्मित-चंद्रशेखर के साथ नृत्य करता।

शिव, शंभु, रुद्र, पशुपति, जिसमें सारा विश्व संनादति,

मैं विश्वनाथ को हृदय में शांति और मोक्ष के लिए प्रणाम करता हूँ। 


श्लोक 11

भवानीसहितं भवं यत् सर्वं विश्वं संनादति सदा,

कामारिः योगीन्द्रनाथः स्मितार्धेन्दुशेखरः प्रभुः।

वृषध्वजः सर्वलोकसुखंकरः कृपासिन्धुरद्वैतः,

नमामि शंभुं हृदये सदा सर्वसिद्धिप्रदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


अनुवाद:

भवानी सहित भव, जिसमें सारा विश्व सदा संनादति,

काम का शत्रु, योगींद्रों का नाथ, अर्धचंद्र से शोभित प्रभु।

वृषभ ध्वज वाला, सभी लोकों को सुख देने वाला, करुणा का सागर, अद्वैत,

मैं सदा सर्वसिद्धि देने वाले शंभु को हृदय में प्रणाम करता हूँ।


 श्लोक 12

सहस्रसूर्यार्चितं भालचन्द्रं यदङ्घ्रौ नटति विश्वम्,

त्रिलोकीनाथः स्मरान्तः सर्वसाक्षी महायोगिनाथः।

शिवं शंभुं परं तं नमामि हृदये सदा सत्यरूपम्,

महातांडवेन यदीये विश्वं संनादति मोक्षदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


अनुवाद:

सहस्र सूर्यों से अर्चित भाल का चंद्रमा, जिनके चरणों में विश्व नृत्य करता,

त्रिलोकनाथ, स्मर का शत्रु, सर्वसाक्षी, महायोगियों का नाथ।

मैं परम शिव, सत्यरूप शंभु को हृदय में सदा प्रणाम करता हूँ,

जिनके महातांडव से विश्व संनादति, मोक्ष देने वाला।


 श्लोक 13

कैलासशृङ्गे विहरति यः स्मितचन्द्रशेखरः प्रभुः,

सर्पालंकारः परशुहस्तः सर्वलोकसुखंकरः सदा।

विश्वं यदीये तांडवे प्रकम्पति गङ्गया सह नादति,

प्रणमामि शंभुं हृदये सदा सौम्यं मोक्षप्रकाशकम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


अनुवाद:

कैलास शिखर पर विहरने वाला, स्मित-चंद्रशेखर प्रभु,

सर्पों से अलंकृत, परशुधारी, सभी लोकों को सुख देने वाला।

जिनके तांडव में विश्व गंगा के साथ कम्पित और नादति है,

मैं सदा सौम्य, मोक्ष का प्रकाश देने वाले शंभु को हृदय में प्रणाम करता हूँ। 


श्लोक 14

सद्योजातः विश्वकर्ता पञ्चवक्त्रः सनातनः प्रभुः,

कामारिः त्रिनेत्रधारी भस्मलिप्तः कृपानिधिः सदा।

नृत्यति यस्य शक्त्या विश्वं संनादति प्रकाशति सदा,

नमामि शंभुं परमं हृदये मोक्षगतिप्रदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


अनुवाद:

सद्योजात, विश्व का कर्ता, पंचमुखी, सनातन प्रभु,

काम का शत्रु, त्रिनेत्रधारी, भस्मलिप्त, करुणा का खजाना।

जिनकी शक्ति से विश्व सदा नृत्य करता और प्रकाशित होता है,

मैं परम शंभु को हृदय में मोक्ष की गति देने वाले को प्रणाम करता हूँ। 


श्लोक 15

यस्य तांडवेन विश्वं प्रकम्पति सौम्यचिदानंदरूपम्,

शिवः शंभुः पशुपतिः सर्वं यत्र संनादति लीनति।

कृपासमुद्रं विश्वनाथं सहस्रनामं सनातनम्,

प्रणमामि तं हृदये शान्तये सर्वसिद्धिप्रदायिनम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


अनुवाद:

जिनके तांडव से विश्व सौम्य चिदानंद रूप में कम्पित होता,

शिव, शंभु, पशुपति, जिसमें सारा विश्व संनादति और लीन होता।

करुणा का समुद्र, विश्वनाथ, सहस्रनाम, सनातन,

मैं शांति और सर्वसिद्धि देने वाले को हृदय में प्रणाम करता हूँ।


 फलश्रुतियः 

पठति शिवतांडवमहिमा स्तोत्रमिदं सौम्यं नवचेतनम्,

स लभति ज्ञानं सिद्धिं शान्तिं च सनातनं शिवसान्निध्यम्।

हृदये ध्यायति शंभुं यः सदा भक्त्या कृपापात्रं भवति,

विश्वं तस्य कृपया संनादति चिदानंदलयेन सौम्यम्।

ॐ नमः शिवाय ॥ 


अनुवाद:

जो इस सौम्य और नवचेतना युक्त शिवतांडवमहिमा स्तोत्र का पाठ करता है,

वह ज्ञान, सिद्धि, सनातन शांति, और शिव की सान्निध्यता प्राप्त करता है।

जो भक्तिपूर्वक हृदय में शंभु का ध्यान करता है, वह कृपा का पात्र बनता है,

और उसका विश्व चिदानंद की लय में सौम्यता से संनादति है।


  🙏ॐ नमः शिवाय 🙏


विक्रम  सिंह 

(अयं स्तोत्रः स्वरचितः अस्ति)

 

बुधवार, 30 जुलाई 2025

त्रिपुरांतकारी तांडवस्तुतिः

 शिवमहिमा 


त्रिपुरांतकारी तांडवस्तुतिः 


ॐ नमः शिवाय

1.

जटाजालसङ्गं गङ्गया संनादति विश्वनाथकः,

कर्पूरगौरं त्रिनयनं डमरुं नादति प्रभुः।

शिवः शंभुः पशुपतिः स्थाणुः विश्वेशः सनातनः,

महेश्वरः कालहा च रुद्रः पिनाकी सर्वदा सदा।

महातांडवेन विश्वमेतत् कम्पति तस्य पादतः,

नमामि शंभुं सत्यरूपं हृदये मोक्षदायकम्॥

  2.

सहस्रचन्द्रार्चि भालदेशे शशांकं ज्वलति प्रभम्,

नीलकण्ठः कामहा च विश्वरक्षः स्मरारिहा।

हरः भवः शूलपाणिः पशुपतिर्मृत्युंजयः परः,

सदाशिवः विश्वकर्ता योगिनां चित्तसंनादति।

सृष्ट्यंतकर्तारं विश्वरूपं सर्वं त्वयि संनादति,

ध्यायामि शंभुं हृदये मे शांतये सर्वसिद्धिदम्॥ 

 3.

सनातनं शंभुं गजचर्मं कपालमालिनं परम्,

कैलासवासः योगिनाथः सुरासुरैः संस्तुतं सदा।

नटराजः त्रिपुरहा च विश्वपः सर्वदायकः,

महाकालः शङ्करः च भस्माङ्गः कृत्तिवासकः।

त्रिपुरं संहृत्य नृत्यति यः विश्वं तस्य चरणयोः,

नमामि शरण्यं पापहं च करुणासिन्धुमीश्वरम्॥ 

 4.

विरूपनेत्रं तेजसंनादं शक्त्या संयुतं महान्,

उमापतिः शर्वः चैव विश्वनाथः स्मरांतकः।

पशुपतिर्महादेवः सर्वज्ञः सर्वगोचरः,

सदाशिवः विश्वमूर्तिः सर्वं त्वयि संनादति सदा।

महातमोहं विश्वरूपं चराचरस्य नायकम्,

ध्यायामि शंभुं हृदये मे मोक्षाय सर्वदा सदा॥

  5.

सहस्रनामं गंधर्वगीतं मुनयो यस्य कीर्तति,

त्रिलोकीनाथः कामनाशी चन्द्रमौलिः जटाधरः।

वृषभध्वजः कालकालः सर्वलोकप्रियंकरः,

भवभयहा मृत्युहा च त्रिपुरारिः स्मरारिहा।

स्मरणमात्रं पावनं च मोक्षदं सर्वसिद्धिदम्,

नमामि शंभुं तांडवेन विश्वं यस्य संनादति॥ 

 6.

स्फुरति भालं चन्द्ररूपं डमरुं नादति प्रभुः,

नीललोहितः शूलधारी विश्वपतिर्महेश्वरः।

गङ्गाधरः पञ्चवक्त्रः सर्वदा सर्वसाक्षिकः,

महामृत्युहा विश्वरक्षः सर्वं त्वयि संनादति।

महानृत्येन विश्वमेतत् तव पादतले नृतति,

नमामि शंभुं हृदये मे शांतये मोक्षदायकम्॥ 

 7.

सत्यं शिवं च सुन्दरं च परमं योगिनां गतिः,

सनातनधामं विश्वकर्तारं सर्वं त्वयि संनादति।

पिनाकधारी विश्वनाथः सर्वदः सर्वसङ्ग्रही,

कृपासिन्धुः शङ्करः च भवानीपतिः स्मरारिहा।

कृपया महादेव विश्वमेतत् तव पादे समर्पितम्,

नमामि शंभुं सर्वदा मे हृदये त्वं समुज्ज्वलति॥  

8.

समुद्रमंथनं कृत्वा यः हलाहलं बिभर्ति कण्ठे,

नीलकण्ठः विश्वरक्षः सर्पमालिनः स्मरारिहा।

गङ्गाधरः कैलासवासः सर्वदा सर्वसाक्षिकः,

महायोगी विश्वपतिर्महादेवः सनातनः।

गङ्गां वहति जटायां यः कैलासे संनादति सदा,

नमामि शंभुं हृदये मे सर्वदा मोक्षदायकम्॥  

9.

अर्धनारीश्वरं रूपं शक्तिशिवं समन्वितं परम्,

उमासहायः सर्वज्ञः विश्वनाथः स्मरांतकः।

सदाशिवः कामनाशी चन्द्रमौलिः जटाधरः,

महायोगी विश्वरक्षः सर्वं त्वयि संनादति सदा।

यस्य योगेन विश्वमेतत् संनादति सदा सुखम्,

नमामि शंभुं हृदये मे सर्वदा मोक्षदायकम्॥  

10.

सहस्रनामं शिवरूपं यस्य स्तोमति विश्वतः,

नटराजः पशुपतिः च विश्वपतिर्महेश्वरः।

कालकालः शूलपाणिः सर्वदा सर्वसाक्षिकः,

भवभयहा मृत्युहा च त्रिपुरारिः स्मरारिहा।

महाकालं विश्वरूपं विश्वं यस्य नृत्यति चरणे,

नमामि शंभुं हृदये मे शांतये सर्वदा सदा॥  

11.

भवं भवानीसहितं यः सर्वं त्वयि संनादति,

कामारिः योगिनाथः चन्द्रमौलिः जटाधरः।

वृषभध्वजः कालकालः सर्वलोकप्रियंकरः,

महायोगी विश्वरक्षः सर्वं त्वयि संनादति सदा।

सर्वं तव कृपया शंभो मोक्षाय संनादति सदा,

नमामि शंभुं हृदये मे सर्वदा मोक्षदायकम्॥  

12.

जगद्विधातारं त्रिनेत्रं च भस्माङ्गं महेश्वरम्,

शिवः शंभुः पशुपतिः स्थाणुः विश्वेशः सनातनः।

महेश्वरः कालहा च रुद्रः पिनाकी सर्वदा सदा,

नृत्यति यस्य तांडवेन विश्वं संनादति क्षणात्।

सर्वं त्वयि संनादति शंभो सर्वं त्वयि लीनति,

नमामि शंभुं हृदये मे सर्वदा मोक्षदायकम्॥


विक्रम सिंह (स्वरचित)

 जटाओं में गंगा संनादति है, विश्वनाथ, करपूर जैसे गौरवर्ण, त्रिनेत्रधारी प्रभु डमरु बजाते हैं। उनके तांडव से विश्व कंपित होता है। मैं सत्यरूप शंभु को नमन करता हूँ, जो हृदय में मोक्ष देते हैं।

2. भाल पर सहस्र चंद्रों की आभा चमकती है, काल का काल, भस्म से रंजित, भक्तों के दुख हरने वाले। मैं विश्वरूप महादेव का ध्यान करता हूँ, जो सदा शांति और सिद्धि देते हैं।

3. सनातन शंभु, गजचर्म धारी, कपालमाला से सुशोभित, कैलास पर विराजमान। त्रिपुर संहार कर विश्व को अपने चरणों में नचाने वाले, मैं करुणा के सागर को नमन करता हूँ।

4. विरूप नेत्रों से तेज संनादित, शक्ति से युक्त, विश्व के नायक। सदाशिव के प्रभाव से सारा लोक संनादति है। मैं उन्हें हृदय में ध्यान करता हूँ।

5. सहस्र नामों वाले, जिनका गान गंधर्व और मुनि करते हैं। भव और मृत्यु का भय हरने वाले, मैं त्रिपुरारि को नमन करता हूँ।

6. भाल पर चंद्र चमकता है, डमरु संनादति है। विश्व उनके चरणों में नाचता है। मैं त्रिलोकनाथ, करुणा के सागर को नमन करता हूँ।

7. सत्य, शिव, सुंदर, योगियों की गति। विश्व उनके चरणों में समर्पित है। मैं सदा प्रकाशित शंभु को नमन करता हूँ।

8. समुद्र मंथन कर हलाहल पीने वाले नीलकण्ठ, गंगा को जटाओं में धारण करने वाले। मैं विश्वरक्षक को नमन करता हूँ।

9. अर्धनारीश्वर, शक्ति और शिव का समन्वय। विश्व उनके योग से सुखी है। मैं सर्वलय शंभु को नमन करता हूँ।

10. सहस्र नाम, नटराज, पशुपति, विश्वपति। विश्व उनके चरणों में नाचता है। मैं शंभु को नमन करता हूँ।

11. भवानी सहित भव, कामारि, योगिनाथ। उनकी कृपा से विश्व मोक्ष के लिए संनादति है। मैं शंभु को नमन करता हूँ।

12. जगत के विधाता, त्रिनेत्र, भस्मांग। उनके तांडव से विश्व संनादति और लीन होता है। मैं सदा मोक्षदायक शंभु को नमन करता हूँ। 

विक्रम सिंह 


             🙏ॐ नमः शिवाय🙏