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रविवार, 9 अगस्त 2009

आज रात कुछ थमी-थमी सी

आज रात कुछ थमी-थमी सी

स्वप्न न जानें कैसे भटके
नयनों की कोरो से छलके

दूर स्वान की स्वर भेदी से ,हर आशाये डरी-डरी सी

दर्दो का वह उडनखटोला
ले कर मेरे मन को डोला

स्याह रात की जल-धरा से ,मेरी गागर भरी-भरी सी

शंकाओ का कसता धेरा
कैसा होगा मेरा सवेरा

मंजिल के सिरहाने पर ये ,राहें कैसी बटी-बटी सी

विक्रम

7 टिप्‍पणियां:

  1. मंजिल के सिरहाने पर ये ,राहें कैसी बटी-बटी सी
    बेहतरीन
    दुश्चिंताओ से घिरा सफर
    अनिश्चितताओ का डगर
    बहुत खूब रचा है

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  2. बहुत ही बेह्तेरीं रचना है सर जी..
    गजब है... लाजवाब

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  3. दर्दो का वह उडनखटोला
    ले कर मेरे मन को डोला

    स्याह रात की जल-धरा से ,मेरी गागर भरी-भरी सी

    waah lajawab bhav liye sunder kavita badhai

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  4. मंजिल के सिरहाने पर ये ,राहें कैसी बटी-बटी सी...Umda

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  5. स्वप्न न जानें कैसे भटके
    नयनों की कोरो से छलके

    दूर स्वान की स्वर भेदी से ,हर आशाये डरी-डरी सी
    Bhav bakhubi ukere hain !!

    उत्तर देंहटाएं
  6. शंकाओ का कसता धेरा
    कैसा होगा मेरा सवेरा
    मंजिल के सिरहाने पर ये ,राहें कैसी बटी-बटी सी

    कितना सजीव चित्रण है आपकी रचना में..... इस रचना को गाने में सुनना और भी अच्छा लगेगा ..........

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  7. इस शानदार, लाजवाब और बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

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